बिलासपुर

अरपा भैंसाझार परियोजना: सकरी वितरक नहर में करोड़ों रुपए का भ्रष्टाचार एसडीएम तिवारी और पटवारी मुकेश ने मिलकर किया, तहसीलदार और आरआई को रखा दूर…

बिलासपुर। अरपा भैंसाझार परियोजना के अंतर्गत सकरी वितरक नहर बनाने की आड़ में किए गए करोड़ों रुपए का भ्रष्टाचार परत-दर-परत खुलने लगा है। दस्तावेज के मुताबिक उस समय कोटा के एसडीएम रहे आनंदरूप तिवारी और पटवारी मुकेश साहू ने मिलकर इस भ्रष्टाचार को अंजाम दिया है। प्रकरण बनाने से लेकर पंचनामा तक सिर्फ पटवारी के हस्ताक्षर हैं। इस मामले में तहसीलदार और आरई को दूर रखा गया।

कलेक्टर ने अरपा भैंसाझार परियोजना के तहत सकरी में वितरक नहर के दायरे में जो जमीन आ रही है, उसका अधिग्रहण करने के लिए कोटा एसडीएम को भू-अर्जन अधिकारी का दायित्व सौंपा था। उस समय कोटा में आनंदरूप तिवारी एसडीएम थे और सकरी मन 3 में मुकेश साहू पटवारी थे। वर्तमान में तिवारी तखतपुर एसडीएम हैं और मुकेश का प्रमोशन पाकर आरआई बन गए हैं। उपलब्ध दस्तावेज के मुताबिक सकरी वितरक नहर के दायरे में 19.95 एकड़ जमीन आ रही थी, जिसमें 47 खसरा नंबर और 32 कास्तकार थे। नहर का एलाइनमेंट बनाने के बाद सिंचाई विभाग ने कोटा के भू-अर्जन अधिकारी को सौंप दिया। भूअर्जन अधिकारी तिवारी ने एलाइनमेंट के आधार पर जमीन अधिग्रहण करने के लिए सूचना का प्रकाशन कराया। इसमें उन सभी कास्तकारों के नाम थे, जिनकी जमीन नहर के दायरे में आ रही थी। तय समय में आई दावा-आपत्तियों का निराकरण करने के बाद 46 करोड़ रुपए से अधिक का मुआवजा बनाया गया और शासन को गजट में प्रकाशित करने भेज दिया गया। शासन से फंड आने के बाद भ्रष्टाचार के लिए साजिश रची गई। उपलब्ध दस्तावेज के अनुसार किसानों से जमीन लेने के लिए भू-अर्जन अधिकारी व सकरी मन 3 के पटवारी के बीच वन-टू-वन पत्राचार हुआ। पंचनामा में किसानों के अलावा सिर्फ पटवारी का हस्ताक्षर है। इस काम में तहसीलदार और आरआई को दूर रखा गया। संभवत: प्रदेश का यह पहला मामला होगा, जिसमें जमीन अधिग्रहण करने के लिए तहसीलदार और आरआई को शामिल नहीं किया गया।

दस्तावेज में काट-छांट और कूटरचना

जमीन अधिग्रहण के लिए जो सूची बनाई गई थी, उसमें कई नामों में काट-छांट करते हुए दूसरे किसान का नाम जोड़ दिया गया है, जबकि खसरा नंबर वही है। कुछ ऐसे भी मामले में हैं, जिसमें गजट में नोटिफिकेशन के बाद दूसरे खसरा नंबर की जमीन को जोड़ दिया गया है। इस तरह से कूटरचना करते हुए करोड़ों रुपए का भ्रष्टाचार किया गया है।

भूमि का स्वरूप भी बदल दिया

उपलब्ध दस्तावेज के अनुसार आनंदरूप तिवारी से पहले कोटा में जो एसडीएम थे, उन्होंने धारा 11 में प्रकाशित सभी खसरा नंबर को परीक्षण में सही पाते हुए 21 करोड़ की अनुमानित लागत का प्रस्ताव कलेक्टर को भेजकर स्वीकृति ली थी। उन्होंने धारा 19 में उनका अखबारों में प्रकाशन करा दिया था। उसके बावजूद धारा 19 में अधिसूचित खसरा नंबरों को दरकिनार करते हुए मनमर्जी से बदलते हुए तत्कालीन एसडीएम आनंदरूप तिवारी और पटवारी मुकेश साहू ने कई खसरा नंबर को बदल दिया और उसे करोड़ों रुपए का भुगतान किया है। बताया जा रहा है कि भू-अर्जन अधिकारी और पटवारी ने मिलकर असिंचित भूमि को सिंचित बना दिया। कई ऐसी जमीन को नहर के दायरे में ला दिया गया, जो नहर की एलाइनमेंट से बहुत दूर है। इस जमीन को व्यावसायिक बताते हुए मुआवजा राशि कई गुना बढ़ा दी गई।

बिना सीमांकन के मुआवजा बांटने का खेल

उपलब्ध दस्तावेज के अनुसार नहर के दायरे में जितनी जमीन आ रही थी, उनका पूरा मुआवजा बंट चुका है। इधर, उस जमीन पर नहर निकाली जा रही है, जिसका मुआवजा ही नहीं बंटा है। इसकी जानकारी होने पर जमीन मालिक पवन अग्रवाल पिता राधेश्याम अग्रवाल ने जब आपत्ति की तो उनकी जमीन का सीमांकन करने का आदेश दे दिया गया है। वह भी भरी बरसात में, जबकि 15 जून से 15 अक्टूबर तक सीमांकन पर रोक लगी हुई है। इस प्रकरण के सामने आने से इस दावे को बल मिल रहा है कि भू-अर्जन अधिकारी ने बिना सीमांकन ही 46 करोड़ रुपए से अधिक का मुआवजा बांट दिया। जमीन से जुड़े एक्सपर्ट की मानें तो जब एलाइनमेंट के अनुसार मुआवजा बंट चुका है तो फिर दूसरे किसान की जमीन बची में कैसे आएगी। इससे तो सीमांकन पर सवाल उठना लाजिमी है। जाहिर है, मुआवजा बंट चुका है तो उस जमीन का भी मुआवजा किसी को दिया गया होगा। अब ये तो भू-अर्जन अधिकारी ही बता पाएंगे कि इस जमीन का मुआवजा किस आधार किस किसान को दिया गया। बता दें कि नहर एलाइनमेंट के मुताबिक शारदादेवी अग्रवाल पति पवन अग्रवाल की खसरा नंबर 19/4 में स्थित 1.70 एकड़ जमीन में से एक चौथाई यानी कि 40-45 डिसमिल जमीन ही निकल रही थी, लेकिन उन्हें 1.65 एकड़ जमीन का मुआवजा दिया गया है।

आनंदरूप तिवारी बोले- सीमांकन के आधार पर मुआवजा बंटा

मीडिया को दिए बयान में कोटा के तत्कालीन एसडीएम व भू-अर्जन अधिकारी आनंदरूप तिवारी ने कहा है कि मुआवजा सीमांकन के आधार पर ही बंटा है। उस समय जब सीमांकन किया गया तो पवन अग्रवाल कहां था। उस समय आपत्ति क्यों नहीं की। किसी भी किसान ने यह नहीं बताया कि यह जमीन पवन अग्रवाल की है। पता चला है, अब उसकी जमीन का सीमांकन कराया जा रहा है। यदि नहर में उसकी जमीन निकलेगी तो उसका मुआवजा दे दिया जाएगा।

नोटिस दिया न ही अधिसूचना में नाम है

इस मामले में पवन अग्रवाल पिता राधेश्याम अग्रवाल का कहना है कि उन्हें यह तो सपना नहीं आएगा कि उनकी जमीन से नहर निकल रही है। उन्हें अब तक न तो नोटिस दिया गया है और न ही सूचना प्रकाशन में उनका नाम है। जब नहर बनाने के लिए उनकी जमीन पर मार्किंग की गई, तब उन्हें इसकी जानकारी हुई। इसलिए उन्होंने सिंचाई विभाग में आपत्ति दर्ज कराई है। 25 जून को राजस्व अमला सीमांकन करने आया था, लेकिन बारिश होने की वजह से सीमांकन नहीं हो पाया। राजस्व अमले ने बाद में सीमांकन करने की बात कही है।

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