कांग्रेस

छत्तीसगढ़-पंजाब से लेकर जी-23 तक, कई मोर्चों पर लगी आग से लड़ रही कांग्रेस, कैसे करेगी मुकाबला?…

पंजाब में हो रही उठापटक अब कांग्रेस की एकमात्र चिंता नहीं रही। पार्टी अब वरिष्ठ नेताओं की नाराजगी, दूसरे राज्यों में भी संगठन के स्तर पर संकट और प्रतिरोधी मीडिया से भी लड़ रही है। पिछले कुछ दिनों में पंजाब कांग्रेस अध्यक्ष के पद से नवजोत सिंह सिद्धू के इस्तीफे ने सारी सुर्खियां जरूर बटोर लीं, लेकिन यह इस समय कांग्रेस की इकलौती समस्या नहीं है। 27 सितंबर को गोवा के पूर्व मुख्यमंत्री लुईजिनियो फलेरो ने भी कांग्रेस से इस्तीफा देकर तृणमूल कांग्रेस का दामन थाम लिया था। फलेरो ने कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी को भेजे अपने इस्तीफे में लिखा कि यह अब वो पार्टी नहीं रही जिसके लिए हमने त्याग और संघर्ष किया था। उन्होंने यह भी लिखा कि उन्हें अब “पार्टी के विनाश को बचाने की ना कोई उम्मीद नजर आती है और ना इच्छाशक्ति”।

‘जी-23″ बनाम “जी हुजूर 23’

इसके कुछ ही दिन पहले कांग्रेस की युवा नेता और उस समय महिला कांग्रेस की अध्यक्ष सुष्मिता देव ने भी पार्टी से इस्तीफा दे दिया था। इस्तीफों की इस लंबी फेहरिस्त की ओर इशारा करते हुए पूर्व केंद्रीय मंत्री कपिल सिबल ने एक समाचार वार्ता में कहा कि जिन नेताओं को पार्टी नेतृत्व के करीबी समझा जाता था वो इस्तीफा दे रहे हैं जबकि “हमलोग” जिन्हें पार्टी नेतृत्व के करीब नहीं समझा जाता अभी भी पार्टी के साथ खड़े हैं। सिबल ने कहा, ‘हम जी-23 हैं, जी हुजूर 23 नहीं हैं’। जी-23 उन 23 कांग्रेस नेताओं को कहा जाता है जिन्होंने अगस्त 2020 में सोनिया गांधी को एक चिट्ठी लिखकर पार्टी के बार बार चुनावों में हारने पर चिंता व्यक्त की थी और पार्टी में आमूलचूल परिवर्तन की मांग की थी।

इस समूह में सिबल के अलावा गुलाम नबी आजाद, आनंद शर्मा, मनीष तिवारी, वीरप्पा मोइली, भूपेंद्र सिंह हूडा जैसे कई बड़े नेता शामिल हैं। ताजा इस्तीफों के मद्देनजर सिबल के साथ साथ आजाद ने भी मांग की है कि पार्टी के अंदरूनी फैसले लेने वाली सर्वोच्च संस्था कांग्रेस कार्यकारी समिति की बैठक बुलाई जाए। जी-23 के नेताओं को लेकर पार्टी के एक धड़े में शुरू से लेकर नाराजगी रही है लेकिन 29 सितंबर को पहली बार सिबल के बयान के बाद कुछ कांग्रेस कार्यकर्ताओं द्वारा हिंसक प्रतिक्रिया देखी गई। युवा कांग्रेस के कुछ कार्यकर्ताओं ने नई दिल्ली में सिबल के घर के बाहर प्रदर्शन किया, उनके घर पर टमाटर फेंके और उनकी एक गाड़ी को नुकसान पहुंचाया।

आक्रामक कार्यकर्ता

कार्यकर्ताओं ने ‘जल्दी ठीक हो जाओ, कपिल सिबल’ के पोस्टर उठा रखे थे। उन्होंने ‘पार्टी छोड़ दो! होश में आओ!’ और ‘राहुल गांधी जिंदाबाद!’ के नारे भी लगाए। इन घटनाओं के बाद आनंद शर्मा ने कांग्रेस कार्यकर्ताओं के इस आचरण की निंदा की और कहा कि “असहिष्णुता और हिंसा कांग्रेस की संस्कृति के खिलाफ हैं”। उन्होंने सोनिया गांधी से इन कार्यकर्ताओं के खिलाफ कार्रवाई करने की मांग की।

दूसरी तरफ छत्तीसगढ़ में भी कांग्रेस की अंदरूनी कलह में एक बार फिर उफान आ गया। राज्य के कम से कम 15 कांग्रेस विधायक नई दिल्ली आ गए हैं, जिसकी वजह से एक बार फिर फिर मुख्यमंत्री भूपेश बघेल और स्वास्थ्य मंत्री टीएस सिंह देओ के बीच सत्ता की लड़ाई को लेकर अटकलें तेज हो गई हैं। सिंह देओ के समर्थकों का कहना है कि बघेल के कार्यकाल के ढाई साल पूरे हो गए हैं और पार्टी को अब अपने वादे के मुताबिक सिंह देओ को मुख्यमंत्री बना देना चाहिए। छत्तीसगढ़ में यह संकट काफी समय से चल रहा है लेकिन पार्टी हाई कमान ने अभी तक बघेल को मुख्यमंत्री पद से हटाने का कोई संकेत नहीं दिया है।

मीडिया से लड़ाई

इस बीच अंदरूनी झगड़ों से जूझती पार्टी ने उसके प्रति विशेष रूप से प्रतिरोधी होते मीडिया के एक धड़े के खिलाफ भी मोर्चा खोल दिया है। 28 सितंबर को एक टीवी चैनल पर एक बहस के दौरान चैनल की एंकर ने राहुल गांधी के खिलाफ एक अपशब्द का इस्तेमाल कर दिया, जिसका पार्टी ने काफी आक्रामक तरीके से विरोध किया। भूपेश बघेल समेत कई नेताओं ने सोशल मीडिया पर मीडिया को चेतावनी दी। उसके बाद कुछ कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने चैनल के दफ्तर में घुस कर प्रदर्शन किया और चैनल के अधिकारियों के सामने अपना विरोध जताया। पूरे प्रकरण के बाद चैनल और एंकर ने अभद्र टिप्पणी के लिए माफी मांगी। कुल मिला कर नजर यही आ रहा है कि एक पूर्ण कालिक राष्ट्रीय अध्यक्ष के अभाव से जूझती कांग्रेस इस समय कई चुनौतियों का एक साथ सामना कर रही है। देखना होगा कि पार्टी इन प्रकरणों का सामना मजबूत से कर पाती है या नहीं।

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