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छत्तीसगढ़ का पारंपरिक त्यौहार भोजली

 छत्तीसगढ़ का पारंपरिक त्यौहार भोजली मंगलवार को ग्राम सेंदरी में धूमधाम से मनाया गया। मित्रता, आदर और विश्वास के इस प्रतीक पर्व पर शाम को गांव के छोटे-छोटे बच्चे और महिलाएं सिर पर भोजली लेकर विसर्जन के लिए लोकगीत गाते हुए निकली। इस मौके पर कार्यक्रम का आयोजन किया गया। जिसमें मुख्य अतिथि बिलासपुर प्रेस क्लब के अघ्यक्ष श्री तिलक राज सलूजा नें विजयी प्रतियोगियो को पुरस्कार देकर सम्मानित किया।

 कार्यक्रम को संबोधित करते हुये मुख्य अतिथि श्री सलूजा ने कहा कि छत्तीसगढ़ के त्योहारों में प्रमुख भोजली त्यौहार है। भोजली गीत छत्तीसगढ़ की और एक पहचान है। भोजली याने भो-जली। इसका अर्थ है भूमि में जल हो। महिलायें खुशहाली की कामना कर भोजली देवी को अर्थात प्रकृति के पूजा करती है। छत्तीसगढ़ में महिलायें धान, गेहूँ, जौ या उड़द के थोड़े दाने को एक टोकनी में बोती है। उस टोकनी में खाद मिट्टी पहले रखती है। उसके बाद सावन शुक्ल नवमीं को बो देती है। जब पौधे उगते है, उसे भोजली देवी कहा जाता है। रक्षा बन्धन के बाद भोजली को नदी या तालाब में विसर्जन करते हैं। इस प्रथा को भोजली ठण्डा करना कहते है। भोजली गीत ” देवी गंगा …देवी गंगा लहर तुरंगा ” छत्तीसगढ की पहचान है। उन्होने ग्रामवासियो को भोजली की शुभकामनायें देते खुशहाल छत्तीसगढ की कामना की।

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