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देश-विदेश: केवल एप के भरोसे नहीं हो सकती कोरोना संक्रमित के संपर्क की निगरानी, कोरिया मॉडल सबसे ज्यादा असरदार…

कोरोना संक्रमित व्यक्ति की पहचान और उनके संपर्क में आने वाले लोगों को आगाह करने के लिए दुनिया भर में बनाए गए एप के मिले जुले परिणाम देखने को मिले हैं। उन देशों में एप प्रभावी हुआ है जिन्होंने इसके प्रभावी उपयोग के साथ मे कई अन्य निगरानी के तरीकों को इससे जोड़ा है। जबकि ज्यादातर देशो में एप को ज्यादातर लोगों तक पहुंचाना बड़ी चुनौती है।

कोरिया ने कई तरीकों से की निगरानी

दक्षिण कोरिया मॉडल इस लिहाज से ज्यादा असरदार रहा है। कोरिया में एप के साथ डिजिटल वित्तीय लेनदेन से लोकेशन की पड़ताल, मोबाइल फोन सिग्नल डेटा, और सीसीटीवी फुटेज का संग्रह करके व्यापक डेटाबेस तैयार किया गया और इसके आंकड़े के आधार पर कोरोना 100 एम एप विकसित किया गया। ये एप कोरिया में काफी लोकप्रिय हुआ।

ज्यादा पहुंच बनाना चुनौती

सिंगापुर में भारत के आरोग्य सेतु एप की तरह ही ब्लूटूथ से लिंक करके संक्रमण संपर्क की पड़ताल का एप केवल 25 फीसदी आबादी तक ही पहुंच पाया। हालांकि भारत सहित ज्यादातर देश एप का वैकल्पिक मॉडल को ही अपना रहे हैं। ऑस्ट्रेलिया में काफी लोगों ने एप डाउनलोड किया, लेकिन कोरिया की तरह समग्र रणनीति न होने से नतीजे उस तरह से देखने को नहीं मिले हैं।

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सही परिणाम के लिए ये जरूरी

तकनीकी जानकारों का कहना है कि ज्यादातर एप मोबाइल धारक की इच्छा पर आधारित हैं। अगर वो एप डाउनलोड करता है, ब्लूटूथ ऑन रखता है, हमेशा अपने साथ मोबाइल रखता है, इंटरनेट भी किस तरह से काम करता है आदि कई चीजें सही तरीके से अपेक्षा के अनुरूप घटित होने पर भी समग्र सटीक डेटा तैयार करना मुश्किल है।

निजता की चिंताएं रोड़ा

ज्यादातर जगहों पर निजता की चिंताओं के मद्देनजर ये प्रयोग अपेक्षा के मुताबिक सफल नहीं रहा है। इसकी वजह से भारत मे भी कई राज्यों में घर घर ट्रेसिंग का अभियान शुरू करना पड़ा है। जिन देशों ने कोरिया की तरह ज्यादा समग्र दृष्टिकोण से रणनीति बनाई वहां डिजिटल ट्रेसिंग का प्रयोग अपेक्षाकृत बेहतर रहा है।

बहुस्तरीय रणनीति जरूरी

जानकार मानते हैं कि डिजिटल एप वैकल्पिक रूप में अकेला कारगर ट्रेसिंग का तरीका नही हो सकता। खासतौर पर दुनिया के अनुभव को अगर देखें, तो भारत मे कॉन्टैक्ट ट्रेसिंग के लिए बहुस्तरीय रणनीति पर अमल करना होगा।

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