Thursday, March 26, 2026
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बिलासपुर: देवरीखुर्द क्षेत्र में भूमि पट्टे का संघर्ष: न्यायालय का आदेश के बावजूद अनदेखी का आरोप, कलेक्टर कार्यालय का किया घेराव…

बिलासपुर। देवरीखुर्द क्षेत्र में बसे हुए हजारों गरीब मजदूरों और बेघर लोगों की एक लंबी लड़ाई का केंद्र है भूमि पट्टे की मांग। यह संघर्ष 1978 से चला आ रहा है, जब भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआई) के कार्यकर्ताओं ने गरीब और बेघर लोगों को सरकारी जमीन पर बसाया था। इन लोगों की संख्या 2000 से अधिक है और उन्होंने तब से लेकर अब तक उस भूमि पर अपने घर बना लिए हैं।

समस्या तब शुरू हुई जब मध्यप्रदेश और बाद में छत्तीसगढ़ की सरकारों ने इस जमीन पर बसे लोगों को कब्जा तो करने दिया लेकिन उन्हें मालिकाना हक या भूमि का पट्टा नहीं दिया। 2003 में छत्तीसगढ़ शासन ने इस भूमि को आबादी घोषित किया और बिलासपुर नगर के करीब 8 किमी क्षेत्र में बसे हजारों नागरिकों को पट्टे देने का आदेश दिया। हालांकि, पटवारी रिकॉर्ड में सही ढंग से दर्ज न होने के कारण कई लोगों को आज तक उनका पट्टा नहीं मिल सका।

इस मामले में कई बार जिला प्रशासन और मुख्यमंत्रियों को ज्ञापन देकर अवगत कराया गया, लेकिन कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। इसके बाद, 3 जुलाई 2017 को छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने आदेश दिया कि इस भूमि के काबिजों को पट्टे दिए जाएं और रिकॉर्ड को सही किया जाए। इसके बावजूद, स्थानीय प्रशासन ने इस आदेश को प्रभावी ढंग से लागू नहीं किया, जिससे लोगों में असंतोष बढ़ता गया।

जिला प्रशासन द्वारा 2023 में पट्टा वितरण के लिए एक प्रक्रिया शुरू की गई थी, जिसमें तहसीलदार को जांच कर रिपोर्ट प्रस्तुत करने का निर्देश दिया गया था। हालांकि, यह प्रक्रिया भी अधूरी रही और कोई ठोस परिणाम नहीं निकला।

 प्रभावित लोगों की मांगें

1. न्यायालय के आदेश का पालन: 3 जुलाई 2017 को छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय द्वारा दिए गए आदेश के अनुसार, सभी काबिजों को उनकी जमीन का पट्टा मुफ्त में दिया जाना चाहिए। यह लोगों का मौलिक अधिकार है, जो दशकों से वहां रह रहे हैं।

2. पट्टा वितरण प्रक्रिया में तेजी: प्रशासन द्वारा बनाई गई समितियों और आदेशों के बावजूद, पट्टा वितरण की प्रक्रिया अभी तक पूरी नहीं हुई है। प्रभावित लोग चाहते हैं कि यह प्रक्रिया जल्द से जल्द पूरी की जाए।

3. प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री आवास योजना का लाभ: जो लोग आवास योजना के लिए पात्र हैं, उन्हें प्रधानमंत्री आवास योजना और मुख्यमंत्री आवास योजना के तहत घर दिया जाए, ताकि उनकी आवास समस्या का समाधान हो सके।

इस मुद्दे पर सैकड़ों मजदूर और महिलाएं बार-बार जनदर्शन में आवेदन कर रही हैं, लेकिन अभी तक कोई संतोषजनक प्रतिक्रिया नहीं मिली है। यह स्थिति बताती है कि शासन और प्रशासन के बीच संवाद की कमी है, जिसकी वजह से गरीब और वंचित वर्ग को न्याय नहीं मिल पा रहा है।

देवरीखुर्द के लोगों का यह संघर्ष केवल भूमि के मालिकाना हक का नहीं है, बल्कि उनके अस्तित्व और अधिकारों की लड़ाई है। न्यायालय के आदेश और सरकारी योजनाओं के बावजूद, उनका पट्टा न मिलना प्रशासनिक उदासीनता का प्रतीक है। यह समय है कि प्रशासनिक तंत्र इस मुद्दे को गंभीरता से ले और प्रभावित लोगों को उनका हक दिलाने के लिए ठोस कदम उठाए।

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