बिलासपुर के जिला अस्पताल में एक और गंभीर घटना ने सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं पर सवाल खड़े कर दिए हैं। सरकारी अस्पतालों में मुफ्त उपचार और चिकित्सा सेवाएं प्रदान करने का दावा तो किया जाता है, लेकिन जब डॉक्टर ही अवैध रूप से पैसे मांगने लगे, तो यह न केवल सरकारी व्यवस्था की विफलता है बल्कि आम जनता के विश्वास का भी हनन है। ताज़ा मामला एक महिला मरीज से जुड़ा है, जिसे नसबंदी ऑपरेशन के बदले 6,000 रुपये देने को मजबूर किया गया और पैसे न देने पर डॉक्टर द्वारा उसे ‘नरक’ जाने का श्राप भी मिला।
तखतपुर क्षेत्र के ग्राम सेमरचुआ की रहने वाली जयंत्री पटेल ने जिला अस्पताल में नसबंदी ऑपरेशन कराया था। आरोप है कि इस ऑपरेशन के लिए जिम्मेदार डॉक्टर वंदना चौधरी ने 6,000 रुपये की मांग की। महिला से 2,000 रुपये तत्काल ही वसूल लिए गए, जबकि शेष 4,000 रुपये की मांग पूरी न होने पर उसे मानसिक रूप से प्रताड़ित किया गया। इस मामले ने तब तूल पकड़ा जब महिला ने डॉक्टर की इस मांग और उसके अभद्र व्यवहार को रिकॉर्ड कर लिया। इस ऑडियो के सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद प्रशासन में हड़कंप मच गया।
ऑडियो वायरल होते ही स्वास्थ्य विभाग हरकत में आ गया और स्थिति की गंभीरता को देखते हुए जिला अस्पताल के सिविल सर्जन डॉ. अनिल गुप्ता ने डॉक्टर वंदना चौधरी को शो-कॉज नोटिस जारी किया। इस नोटिस में उनसे स्पष्टीकरण मांगा गया है कि उनके खिलाफ अनुशासनहीनता की शिकायत क्यों न मानी जाए। सरकारी सेवा में इस तरह के कृत्य न केवल सेवा शर्तों के खिलाफ हैं बल्कि जनता के हितों के साथ भी खिलवाड़ है।
इस घटना ने स्वास्थ्य विभाग और सरकारी अस्पतालों में हो रही अवैध वसूली को उजागर किया है। नसबंदी जैसी प्रक्रियाएं, जो मुफ्त होनी चाहिए, अब भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ रही हैं। इससे न केवल गरीब और असहाय मरीजों को नुकसान हो रहा है, बल्कि उनके लिए चिकित्सा सेवाएं भी डर और शोषण का कारण बन रही हैं। राज्य सरकार की इस मामले में अब तक की चुप्पी सवालों के घेरे में है। लोग उम्मीद कर रहे थे कि रायपुर से तुरंत कड़ा कदम उठाया जाएगा, परन्तु अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई है।
डॉ. वंदना चौधरी के खिलाफ मामले ने पूरे स्वास्थ्य विभाग की साख पर बट्टा लगा दिया है। ऐसे मामलों से जनता का विश्वास सरकारी अस्पतालों और मुफ्त सेवाओं से उठ सकता है। अब सवाल यह है कि क्या दोषी डॉक्टर पर कोई ठोस कार्रवाई की जाएगी, या यह मामला भी अन्य घोटालों की तरह दफ्तरों की फाइलों में दब कर रह जाएगा?
इस घटना ने एक बार फिर सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार की आवश्यकता पर बल दिया है। जनता को यह जानने का अधिकार है कि जिन सेवाओं को सरकार मुफ्त में उपलब्ध करवा रही है, वह किस हद तक लोगों तक पारदर्शी और निष्पक्ष रूप से पहुंच रही हैं। सरकार को इस तरह के मामलों को गंभीरता से लेते हुए कठोर कदम उठाने होंगे ताकि भविष्य में इस प्रकार की घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो और सरकारी सेवाओं में जनता का विश्वास बहाल हो सके।
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