बिलासपुर।
उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता, सामाजिक न्याय और भेदभाव-रहित वातावरण सुनिश्चित करने के उद्देश्य से लागू किए गए University Grants Commission (यूजीसी) के नए यूजीसी विनियम 2026 को लेकर देशभर में वैचारिक बहस तेज हो गई है। इसी क्रम में छत्तीसगढ़ के बिलासपुर से राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के नाम एक विस्तृत ज्ञापन प्रेषित किया गया है, जिसमें विनियम के समर्थन के साथ-साथ कई महत्वपूर्ण संशोधनों और ठोस कानूनी कदमों की मांग की गई है।
ज्ञापन में कहा गया है कि उच्च शिक्षा संस्थानों में समान अवसर, सामाजिक समावेशन और भेदभाव के विरुद्ध सख्त तंत्र विकसित करने के लिए यह विनियम एक आवश्यक कदम है। इसलिए इसे देशभर में प्रभावी रूप से लागू किया जाना चाहिए। साथ ही, यदि आवश्यक हो तो संसद में इस विनियम के समर्थन में स्पष्ट कानून पारित कर इसे और अधिक कानूनी मजबूती प्रदान की जाए, ताकि भविष्य में किसी भी प्रकार की संवैधानिक या न्यायिक चुनौती के सामने यह ठोस आधार पर कायम रह सके।

ज्ञापन में उल्लेख किया गया है कि विनियम के खिलाफ विभिन्न न्यायालयों में याचिकाएं दायर की गई हैं। इस संदर्भ में सरकार से अपेक्षा की गई है कि वह अनुभवी और सक्षम विधि-विशेषज्ञों की नियुक्ति सुनिश्चित करे, ताकि आगामी सुनवाई की तिथियों पर विनियम का प्रभावी और ठोस पक्ष रखा जा सके। ज्ञापन में यह भी कहा गया है कि सामाजिक न्याय से जुड़े प्रावधानों की रक्षा के लिए सरकार की सक्रिय भूमिका अत्यंत आवश्यक है।
दस्तावेज़ में अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) को जातिगत उत्पीड़न से संरक्षण देने के प्रावधान का स्पष्ट समर्थन किया गया है। ज्ञापन का तर्क है कि भारतीय समाज में जातिगत भेदभाव का प्रभाव केवल अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) तक सीमित नहीं रहा, बल्कि OBC समुदाय भी इससे प्रभावित रहा है। ऐसे में उन्हें विनियम के दायरे में शामिल करना सामाजिक न्याय के सिद्धांत के अनुरूप है।
हालांकि, आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) को इस विनियम में शामिल करने पर आपत्ति दर्ज की गई है। ज्ञापन के अनुसार, यह विनियम मूलतः सामाजिक और जातिगत भेदभाव से निपटने के लिए बनाया गया है, जबकि आर्थिक असमानता एक अलग प्रकृति की समस्या है, जिसके समाधान के लिए पृथक कानूनों और नीतियों की आवश्यकता है।
ज्ञापन में उच्च शिक्षा संस्थानों में गठित शिकायत निवारण प्रकोष्ठों की संरचना पर भी सवाल उठाए गए हैं। इसमें सुझाव दिया गया है कि केवल मेरिट के आधार पर नामित छात्रों के बजाय निर्वाचित छात्र प्रतिनिधियों को शामिल किया जाए, ताकि लोकतांत्रिक जवाबदेही और पारदर्शिता सुनिश्चित हो सके। साथ ही SC/ST/OBC वर्ग से अनिवार्य प्रतिनिधित्व का स्पष्ट प्रावधान जोड़े जाने की मांग की गई है।
ज्ञापन में केंद्रीय विश्वविद्यालयों और अन्य उच्च शिक्षा संस्थानों में शिक्षकों के सामाजिक प्रतिनिधित्व को लेकर चिंता व्यक्त की गई है। इसमें कहा गया है कि उपलब्ध आंकड़े सामाजिक असंतुलन की ओर संकेत करते हैं। इस असमानता को दूर करने के लिए लंबित (बैकलॉग) पदों पर भर्ती को तत्काल प्रभाव से लागू करने और सभी संस्थानों में समान रूप से पालन सुनिश्चित करने की मांग की गई है।
दस्तावेज़ में यह भी कहा गया है कि समुचित प्रतिनिधित्व और नीति निर्माण के लिए सटीक सामाजिक आंकड़े आवश्यक हैं। इसलिए जातिगत जनगणना को अनिवार्य कदम बताया गया है। ज्ञापन के अनुसार, जब तक ठोस और अद्यतन डेटा उपलब्ध नहीं होगा, तब तक समानता और न्याय की दिशा में प्रभावी नीतियां बनाना कठिन रहेगा।
विनियम के संभावित दुरुपयोग को लेकर उठाए जा रहे सवालों को ज्ञापन में निराधार बताया गया है। तर्क दिया गया है कि किसी भी कानून के दुरुपयोग की आशंका के आधार पर उसे समाप्त करना उचित नहीं है। इसके बजाय पारदर्शी प्रक्रियाएं और जवाबदेही तंत्र मजबूत किए जाने चाहिए, ताकि न्याय और संतुलन दोनों कायम रह सकें।


