बिलासपुर।
शिक्षा व्यवस्था की विश्वसनीयता तब कठघरे में खड़ी हो जाती है, जब नियमों को लागू करने वाली संस्थाएं ही उनकी अनदेखी करती नजर आएं। बिलासपुर सहित प्रदेश के कई शहरों में संचालित नारायणा टेक्नो स्कूल से जुड़े तथ्यों ने न केवल एक संस्थान, बल्कि पूरी मान्यता प्रक्रिया और प्रशासनिक निगरानी तंत्र पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
इस पूरे मामले की सबसे अहम कड़ी स्थानीय प्रबंधन समिति की वैधानिकता है। नियमों के अनुसार किसी भी निजी शैक्षणिक संस्था के संचालन के लिए स्थानीय स्तर पर पंजीकृत और जवाबदेह समिति का होना अनिवार्य होता है, लेकिन उपलब्ध जानकारी बताती है कि यहां यह व्यवस्था केवल औपचारिकता बनकर रह गई। चौंकाने वाली बात यह है कि स्कूल को मान्यता मिलने के बाद 5 जनवरी 2026 को समिति का पंजीयन कराया गया, जिससे यह संदेह गहराता है कि पहले संचालन शुरू किया गया और बाद में नियमों की पूर्ति की गई।
वित्तीय पारदर्शिता के मामले में भी स्थिति संतोषजनक नहीं दिखती। किसी भी वैधानिक संस्था के लिए बैंक खाता, लेखा-जोखा और नियमित ऑडिट बुनियादी आवश्यकताएं होती हैं, लेकिन यहां इनका स्पष्ट अभाव नजर आता है। अभिभावकों से ली जाने वाली फीस का स्थानीय स्तर पर न तो उपयोग होता है और न ही उसका लेखांकन, बल्कि यह राशि सीधे महाराष्ट्र और बेंगलुरु स्थित बाहरी खातों में जमा की जा रही है। रसीदों में स्थानीय नाम और बैंकिंग विवरण में बाहरी संरचना का होना इस व्यवस्था की दोहरी प्रकृति को उजागर करता है।
समिति की संरचना भी सवालों के घेरे में है। जिन लोगों को संस्था की पारदर्शिता सुनिश्चित करनी चाहिए, वे स्वयं संस्था के कर्मचारी बताए जा रहे हैं। न कोई स्वतंत्र सदस्य, न अभिभावकों की भागीदारी और न ही स्थानीय प्रतिनिधित्व—ऐसी स्थिति में समिति की निष्पक्षता और जवाबदेही स्वतः संदिग्ध हो जाती है। यह भी स्पष्ट होता है कि यह ढांचा स्थायी जिम्मेदारी निभाने के बजाय केवल कागजी औपचारिकता के रूप में खड़ा किया गया।
मामले का सबसे गंभीर पहलू छात्रों के डेटा और शैक्षणिक रिकॉर्ड में पाई गई विसंगतियां हैं। एक ही छात्र का अलग-अलग स्थानों पर पंजीयन और अलग-अलग यू-डाइस कोड के साथ परीक्षा में शामिल होना केवल तकनीकी त्रुटि नहीं माना जा सकता। यह सीधे तौर पर डेटा प्रबंधन प्रणाली के दुरुपयोग और निगरानी तंत्र की विफलता की ओर संकेत करता है, जिससे पूरे शिक्षा ढांचे की विश्वसनीयता प्रभावित होती है।
दस्तावेजों की प्रामाणिकता पर भी सवाल उठ रहे हैं। अनापत्ति प्रमाण पत्र जैसे संवेदनशील दस्तावेजों में हस्तलिखित संशोधन और संदिग्ध हस्ताक्षर इस आशंका को मजबूत करते हैं कि प्रक्रिया के साथ समझौता किया गया है। यह केवल लापरवाही नहीं, बल्कि गंभीर अनियमितता का संकेत माना जा रहा है।
इसके अलावा, तीसरी इकाई के रूप में सामने आ रही एक कंपनी की भूमिका भी जांच के दायरे में है। यदि फीस संग्रहण और वित्तीय प्रबंधन में ऐसी इकाई शामिल है, जिसका स्थानीय पंजीयन और वैधानिक आधार स्पष्ट नहीं है, तो यह शिक्षा व्यवस्था में बाहरी और अपारदर्शी हस्तक्षेप की ओर इशारा करता है।
पूरे घटनाक्रम में प्रशासनिक निगरानी की भूमिका भी सवालों के घेरे में है। जिन मामलों में तहसीलदार और एसडीएम स्तर पर जांच अनिवार्य होती है, वहां यदि केवल औपचारिकता निभाई गई, तो यह प्रणालीगत शिथिलता का संकेत है। यह सवाल भी उठता है कि यदि वास्तविक निरीक्षण किया गया होता, तो क्या इतनी स्पष्ट विसंगतियां सामने आने से बच पातीं?
यह मामला केवल एक स्कूल तक सीमित नहीं दिखता। रायपुर, दुर्ग और भिलाई में संचालित शाखाओं को लेकर भी समान प्रकार की आशंकाएं सामने आ रही हैं, जिससे यह संकेत मिलता है कि समस्या का दायरा व्यापक हो सकता है। यदि मान्यता प्रक्रिया में ही पारदर्शिता नहीं रही, तो पूरे नेटवर्क की वैधानिकता पर प्रश्नचिह्न लगना स्वाभाविक है।
अंततः यह केवल प्रशासनिक जांच का विषय नहीं, बल्कि सार्वजनिक विश्वास का मामला बन चुका है। यदि अनियमितताएं सिद्ध होती हैं, तो इसका सीधा असर अभिभावकों की आर्थिक सुरक्षा और छात्रों के भविष्य पर पड़ेगा। ऐसे में आवश्यक है कि पूरे प्रकरण की स्वतंत्र, निष्पक्ष और गहन जांच कराई जाए, जिसमें दस्तावेजों, वित्तीय लेनदेन और मान्यता प्रक्रिया की हर कड़ी की बारीकी से पड़ताल हो।


