बिलासपुर। जिला शिक्षा विभाग एक बार फिर गंभीर विवादों के केंद्र में है, जहां प्रशासनिक पारदर्शिता और वित्तीय अनुशासन पर बड़े सवाल खड़े हो गए हैं। युवा कांग्रेस के प्रदेश महासचिव अंकित गौरहा द्वारा प्रदेश के प्रमुख सचिव को सौंपी गई विस्तृत शिकायत ने विभाग के भीतर कथित भ्रष्टाचार की कई परतें उजागर कर दी हैं। शिकायत में प्रभारी जिला शिक्षा अधिकारी विजय टांडे और स्थापना शाखा के जूनियर ऑडिटर सुनील यादव पर वित्तीय गबन से लेकर अनुकंपा नियुक्ति और युक्तियुक्तिकरण प्रक्रिया में बड़े पैमाने पर अनियमितताओं के आरोप लगाए गए हैं।
मामले का सबसे गंभीर पहलू कोटा विकासखंड से जुड़ा है, जहां आरोप है कि सितंबर 2024 से फरवरी 2025 के बीच एक ही कर्मचारी को लगभग 30 लाख रुपए का भुगतान कर दिया गया। यह राशि “अन्य भत्ता” और “वर्दी धुलाई भत्ता” जैसे मदों में दी गई, जो सामान्य वेतन संरचना से कई गुना अधिक बताई जा रही है। शिकायत के मुताबिक हर महीने 4 से 4.5 लाख रुपए तक का भुगतान एक ही कर्मचारी को किया गया, जिससे पूरे वित्तीय तंत्र की विश्वसनीयता पर सवाल उठ रहे हैं।
अंकित गौरहा का आरोप है कि उस समय विजय टांडे न केवल विकासखंड शिक्षा अधिकारी थे, बल्कि आहरण एवं संवितरण अधिकारी की जिम्मेदारी भी उनके पास थी। ऐसे में इतने बड़े भुगतान बिना उनकी जानकारी और स्वीकृति के संभव नहीं माने जा रहे। शिकायत में मांग की गई है कि संबंधित अधिकारी और कर्मचारी के बैंक खातों की गहन जांच कर वास्तविक लेन-देन और संभावित सांठगांठ का खुलासा किया जाए।
यह मामला कलेक्टर की समय-सीमा बैठकों में भी उठ चुका है और थाना कोटा में अपराध दर्ज होने के बावजूद अब तक किसी ठोस कार्रवाई का अभाव प्रशासनिक उदासीनता को दर्शाता है। आरोप यह भी है कि पूरे प्रकरण से ध्यान हटाने के लिए निचले स्तर के कर्मचारियों—क्लर्क और भृत्य—को निलंबित कर दिया गया, जबकि मुख्य जिम्मेदारी उच्च अधिकारियों की बताई जा रही है।
शिकायत में वित्तीय दस्तावेजों में हेरफेर का भी जिक्र है। आरोप है कि मासिक व्यय पत्रक और बजट दस्तावेजों में गड़बड़ी कर वास्तविक वित्तीय स्थिति को छिपाया गया। हस्ताक्षरित दस्तावेजों के बावजूद आंकड़ों में अंतर सामने आने की बात कही गई है, जो संभावित गबन की ओर इशारा करता है।
यह पहला मामला नहीं है जब इस तरह के आरोप सामने आए हैं। पूर्व में सहायक ग्रेड-2 के एक प्रकरण में कार्रवाई हुई थी, लेकिन उसी मामले में विजय टांडे पर कोई कदम नहीं उठाया गया। वहीं, एक दिवंगत शिक्षक की पत्नी द्वारा रिश्वत मांगने की शिकायत भी जांच में सही पाई गई थी, लेकिन कार्रवाई सीमित दायरे में ही सिमट कर रह गई। इसके बावजूद संबंधित अधिकारी को पदोन्नति देकर प्रभारी जिला शिक्षा अधिकारी बना दिया जाना भी सवालों के घेरे में है।
अनुकंपा नियुक्ति प्रक्रिया को लेकर भी शिकायत में गंभीर आरोप लगाए गए हैं। कहा गया है कि पात्र परिजनों को दरकिनार कर अन्य लोगों को लाभ पहुंचाया गया। इस प्रक्रिया में नियमों की अनदेखी और कथित लेन-देन की भूमिका को भी उजागर किया गया है, जिसमें सुनील यादव की भूमिका को अहम बताया गया है।
युक्तियुक्तिकरण प्रक्रिया में भी बड़े स्तर पर अनियमितता सामने आई है। आरोप है कि जिला और विकासखंड स्तरीय समितियों की मंजूरी के बिना ही करीब 200 मामलों में संशोधन कर दिए गए। कई आदेशों में न तो हस्ताक्षर हैं, न नोटशीट और न ही संबंधित अधिकारियों को जानकारी दी गई। कुछ मामलों में न्यायालय के निर्देश का हवाला दिया गया, लेकिन अधिकांश निर्णय गोपनीय तरीके से लिए गए और बाद में उन्हें लागू कर दिया गया।
अंकित गौरहा ने पूरे प्रकरण को एक सुनियोजित षड्यंत्र करार देते हुए कहा है कि जब समितियां मौजूद हैं, तो उन्हें दरकिनार कर फैसले कैसे लिए जा रहे हैं। उन्होंने यह भी आशंका जताई है कि पद पर बने रहने से संबंधित अधिकारी चल रही जांचों को प्रभावित कर सकते हैं।
शिकायत में मांग की गई है कि विजय टांडे को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच कराई जाए। साथ ही, सुनील यादव के खिलाफ भी प्रस्तुत साक्ष्यों के आधार पर कड़ी कार्रवाई की जाए।
अब देखना यह होगा कि इतने गंभीर आरोपों के बाद शासन-प्रशासन किस तरह की कार्रवाई करता है—क्या यह मामला भी फाइलों में दबकर रह जाएगा या फिर वास्तव में जवाबदेही तय होगी।


