Saturday, August 30, 2025
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धरना-प्रदर्शन करनेवाले दलों के नेताओं के खिलाफ दर्ज हो मुकदमा : सुप्रीम कोर्ट

धरना-प्रदर्शन के दौरान जान-माल के नुकसान को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने सख्त रुख अख्तियार किया है। अदालत ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में अदालतों का गठन करने का निर्देश दिया है। इन अदालतों के जरिये धरना-प्रदर्शनों में होने वाली क्षति की जवाबदेही तय की जाएगी और पीड़ितों को मुआवजा दिलाया जाएगा।

न्यायमूर्ति आदर्श कुमार गोयल और न्यायमूर्ति यूयू ललित की पीठ ने केंद्र सरकार को सलाह दी है कि संबंधित हाईकोर्ट की सलाह पर जिला जजों को प्रदर्शन के दौरान उत्पाती तत्वों के खिलाफ मुकदमा चलाने की जिम्मेदारी दी जाए।

पीठ ने यह भी कहा कि निजी या सार्वजनिक संपत्तियों को नुकसान पहुंचने पर प्रदर्शन करने वाले दल या संस्था के नेताओं के खिलाफ आपराधिक मुकदमा चलना चाहिए।

पीठ ने कहा कि वर्ष 2009 में सुप्रीम कोर्ट ने इस संबंध में दिशानिर्देश जारी किया था, लेकिन पीड़ितों को मुआवजा देने को लेकर अभी कोई तंत्र नहीं है। अक्सर प्रदर्शनों के दौरान जान-माल की क्षति होती है।

ऐसे मसले को सुप्रीम कोर्ट या हाईकोर्ट से निपटारा मुश्किल है। लिहाजा कोई ऐसा फोरम हो, जहां लोग शिकायत और राहत की मांग कर सकें। शीर्ष अदालत ने यह फैसला वकील कोशी जैकब की याचिका पर सुनाया है। याचिका में वर्ष 2009 के गाइडलाइंस के अनुपालन की गुहार लगाई गई थी।

शीर्ष अदालत ने कहा कि भले ही संविधान में शांतिपूर्ण प्रदर्शन का अधिकार दिया गया है, लेकिन संपत्तियों को नुकसान पहुंचाने या हिंसक प्रदर्शन करने का अधिकार नहीं है। पीठ ने कहा कि शांति बनाने में विफल रहने वालों को जिम्मेदार ठहराया जाना चाहिए और पीड़ितों को मुआवजा मिलना चाहिए।

केंद्र सरकार की ओर से पेश अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने सुप्रीम कोर्ट की सलाह को मानते हुए कहा कि सरकार ‘प्रिवेंशन ऑफ डैमेज टू पब्लिक प्रॉपर्टी एक्ट’ में संशोधन करने को लेकर कदम उठा चुकी है।

उन्होंने कहा कि विधेयक का प्रारूप तैयार कर लिया गया है। गृह मंत्रालय की वेबसाइट पर इसे अपलोड कर सभी पक्षकारों से राय मांगी गई है। इस पर पीठ ने कहा कि आशा करते हैं कि सरकार हमारी सलाह पर गौर करेगी। अटॉर्नी जनरल ने पिछले दिनों दार्जिलिंग में हुए हिंसक प्रदर्शन का भी जिक्र किया। 

क्या है मामला

अधिवक्ता जैकब ने खुद याचिका दाखिल कर कहा है कि 2012 में केरल में एलडीएफ-पीडीपी दलों की हड़ताल के कारण उन्हें 12 घंटे सड़क पर बिताना पड़ा था। आंख के ऑपरेशन के बाद अस्पताल से डिस्चार्ज होकर घर पहुंचने में 12 घंटे से ज्यादा समय लग गया था।

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