Sunday, March 15, 2026
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मुख्यमंत्री अशोक गहलोत को सचिन पायलट से क्यों इतनी है दिक्कत, इस तस्वीर में भी है एक दिलचस्प राज…

राजस्थान में इन दिनों सिर्फ एक ही बात की चर्चा है, गहलोत बनाम पायलट का अंजाम क्या होगा? प्रदेश में कांग्रेस के दोनों बड़े नेताओं के बीच टकराव का परिणाम क्या होगा यह तो आने वाले दिनों में साफ होगा, लेकिन आइए फिलहाल आपको बताते हैं कि ऐसी नौबत आई क्यों है। आखिर पायलट और गहलोत के बीच ऐसी अदावत हुई क्यों? यूं तो इसकी कई पुरानी वजहें हैं, लेकिन एक वजह ऊपर लगी इस तस्वीर में भी छिपी है।

यह तस्वीर 2018 में विधानसभा चुनाव के बाद अशोक गहलोत के शपथ ग्रहण समारोह की है। जयपुर के अल्बर्ट हॉल में ली गई इस तस्वीर में आप देख सकते हैं कि मंच पर तब के राज्यपाल कल्याण सिंह के साथ एक तरफ मुख्यमंत्री अशोक गहलोत हैं तो दूसरी तरफ तब उपमुख्यमंत्री पद की शपथ लेने वाले सचिन पायलट। जानकारों की मानें तो उस समय गहलोत को यही बात खटक गई थी। वह चाहते थे कि मंच पर राज्यपाल के साथ सिर्फ उनके लिए कुर्सी लगे, जब सचिन पायलट के लिए भी वहां कुर्सी लगाई गई तो गहलोत को यह नागवार गुजरा। उन्हें इसे इस रूप में लिया कि पायलट उनकी बराबरी की कोशिश कर रहे हैं।

विधानसभा चुनाव परिणाम आने के बाद जब कांग्रेस सत्ता में पहुंची तो दोनों नेता मुख्यमंत्री बनने के लिए दांव-पेंच लगाने लगे थे। युवा बनाम अनुभवी की इस लड़ाई में पार्टी ने बीच का रास्ता निकालते हुए गहलोत को मुख्यमंत्री बनाया तो पायलट को उनके डेप्युटी के रूप में जिम्मेदारी दी गई। बताया जाता है कि 2014 में पायलट के प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष बनाए जाने के बाद गहलोत को लगने लगा था कि उन्हें दरकिनार किया जा रहा है। चुनाव बाद जब गहलोत को सत्ता मिली तो वह पायलट को किनारे लगाने लगे। बताया जाता है कि कैबिनेट की बैठकों में भी शुरुआत में पायलट गहलोत करीब बैठते नजर आए, लेकिन बाद में उनकी कुर्सी मंत्रियों के बीच लगाए जाने लगी।

दोनों नेताओं के बीच धीरे-धीरे दूरियां बढ़ने लगी और अंजाम 2020 की बगावत के रूप में सामने आया, जिसने आग में घी का काम किया। पायलट अपने समर्थक विधायकों के साथ बीजेपी शासित हरियाणा पहुंच गए तो गहलोत ने अपने विधायकों को होटल में 34 दिन तक कैद किए रखा। गहलोत की सरकार खतरे में पड़ चुकी थी। अटकलें लगाई जा रही थीं कि पायलट अपने खेमे के साथ बीजेपी में शामिल हो सकते हैं। हालांकि, बाद में खुद राहुल गांधी और प्रियंका गांधी ने हस्तक्षेप किया और पायलट को भविष्य के लिए भरोसा देकर मनाने में कामयाब रहे। पायलट तब से ही बिना किसी पद के अपने लिए मौके की तलाश में है तो गहलोत उन्हें अब तक माफ नहीं कर पाए हैं। गहलोत के मन में पायलट के लिए कितनी कड़वाहट वह कई बार उनके मुंह से ही निकल चुकी है। अब उन्होंने पायलट का रास्ता रोकने के लिए कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में अपने प्रमोशन को भी दांव पर लगा दिया है।

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