बिलासपुर। छत्तीसगढ़ के बिलासपुर स्थित उच्च न्यायालय ने 24 अक्टूबर, 2024 को दैनिक अखबार में प्रकाशित एक समाचार के आधार पर स्वप्रेरणा से जनहित याचिका (पीआईएल) दर्ज की। इस समाचार में दशहरा उत्सव के बाद मूर्तियों के विसर्जन से हुए प्रदूषण की गंभीर स्थिति का वर्णन किया गया था। रिपोर्ट में बताया गया कि खारुन नदी के पास स्थित एक तालाब में विसर्जित मूर्तियों के अवशेष, मिट्टी और अन्य सामग्रियों को छोड़ दिया गया, जिससे तालाब का पानी प्रदूषित हो गया और यह दलदल में तब्दील हो गया। सबसे चिंता की बात यह थी कि स्थानीय बच्चे इस प्रदूषित और खतरनाक क्षेत्र में खेलते देखे गए, जिससे उनकी सुरक्षा पर सवाल उठे।
समाचार को गंभीरता से लेते हुए, उच्च न्यायालय ने इस मामले पर स्वतः संज्ञान लिया और जनहित याचिका के माध्यम से नगर प्रशासन को सफाई के निर्देश दिए। इस मामले की सुनवाई के दौरान राज्य की ओर से महाधिवक्ता प्रफुल्ल एन. भारत और उप महाधिवक्ता शशांक ठाकुर ने उपस्थित होकर न्यायालय को जानकारी दी। इसके अलावा, प्रतिवादी संख्या 4 और 6 की ओर से श्री विवेक शर्मा पेश हुए।
सुनवाई के दौरान यह तथ्य सामने आया कि नगर निगम के आयुक्त ने पहले ही तालाब की तत्काल सफाई का आदेश दिया था और विसर्जन के बाद तालाब का पानी खाली करने के निर्देश दिए गए थे। हालांकि, अखबार में प्रकाशित तस्वीरें स्थिति की गंभीरता को स्पष्ट रूप से दर्शा रही थीं, जिससे यह साबित हुआ कि तालाब अभी भी प्रदूषित और खतरनाक स्थिति में था। इससे यह जाहिर हुआ कि सफाई के कार्य में तेजी लाने और प्रदूषण पर नियंत्रण रखने की तत्काल आवश्यकता है।
राज्य के महाधिवक्ता ने न्यायालय को बताया कि रायपुर के जिला मजिस्ट्रेट द्वारा तालाब की सफाई के लिए आवश्यक कदम उठाए जा चुके हैं। हालांकि, न्यायालय ने यह सुनिश्चित करने के लिए एक ठोस कदम उठाते हुए नगरीय प्रशासन एवं विकास मंत्रालय, अटल नगर, नवा रायपुर के सचिव को निर्देशित किया कि वे राज्य के प्रत्येक जिले से एक व्यक्तिगत हलफनामा प्रस्तुत करें। इस हलफनामे में यह स्पष्ट किया जाए कि विसर्जन स्थल की सफाई की गई है या नहीं। इसके साथ ही, रायपुर के जिला मजिस्ट्रेट को भी रायपुर में सफाई की स्थिति पर व्यक्तिगत हलफनामा जमा करने के निर्देश दिए गए।
यह निर्णय छत्तीसगढ़ राज्य में पर्यावरण संरक्षण और जन सुरक्षा के प्रति न्यायालय की सक्रियता और जिम्मेदारी को दर्शाता है। खासकर ऐसे समय में जब धार्मिक उत्सवों के बाद जल संसाधनों के प्रदूषण की समस्या गंभीर रूप से उभर कर सामने आती है, न्यायालय की इस पहल से अन्य जिलों और प्रशासनिक निकायों पर भी दबाव बनेगा कि वे इस दिशा में उचित कदम उठाएं। न्यायालय द्वारा हलफनामे प्राप्त करने और रिपोर्ट की समीक्षा के बाद इस मामले को फिर से सूचीबद्ध किया जाएगा, जिससे यह सुनिश्चित किया जा सकेगा कि सभी निर्देशों का पालन हो और समस्या का स्थायी समाधान निकाला जा सके।
यह मामला न केवल प्रशासनिक सतर्कता की आवश्यकता को उजागर करता है, बल्कि सामाजिक जागरूकता और जिम्मेदारी की भी मांग करता है, जिससे पर्यावरण संरक्षण को गंभीरता से लिया जाए और भावी पीढ़ियों के लिए स्वच्छ और सुरक्षित जल संसाधनों का संरक्षण हो सके।


