Thursday, March 26, 2026
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बिलासपुर: समाज से बहिष्कृत महिला की न्याय की गुहार: सामाजिक बहिष्कार के खिलाफ हाईकोर्ट की शरण में मुनिका जैन…

बिलासपुर। आज के युग में भी सामाजिक बहिष्कार की कुरीतियों से पीड़ित महिलाओं की स्थिति अत्यंत चिंता का विषय बनी हुई है। ऐसा ही एक मामला छत्तीसगढ़ के कांकेर जिले से सामने आया है, जहां एक महिला, मुनिका जैन, और उसकी छोटी बच्ची सामाजिक बहिष्कार का शिकार हो गए। न्याय पाने की उम्मीद में मुनिका ने अंततः छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया है।

मुनिका जैन की शादी लखनपुरी गढ़िया पारा के रहने वाले राजेश्वर कुमार जैन से हुई थी, जो वर्तमान में भारत-तिब्बत सीमा पुलिस (ITBP) में चाइना बॉर्डर पर तैनात हैं। शादी के कुछ समय बाद ही पति-पत्नी के बीच तनाव और विवाद शुरू हो गया, जो धीरे-धीरे बढ़ता गया और कुछ सालों के भीतर कानूनी मामलों तक पहुंच गया। मुनिका ने कांकेर थाने में अपने पति के खिलाफ मारपीट और भरण-पोषण का मामला दर्ज कराया। यह कदम समाज के कुछ प्रभावशाली लोगों को नागवार गुजरा और इसके परिणामस्वरूप, गांव की एक बैठक में मुनिका और उसके पूरे परिवार को समाज से बहिष्कृत कर दिया गया।

यह बहिष्कार केवल मुनिका तक ही सीमित नहीं रहा; इसका प्रभाव उसके परिवार की अन्य महिलाओं पर भी पड़ा। मुनिका की बहन की शादी की संभावनाओं को भी जानबूझकर बाधित किया गया। इतना ही नहीं, समाज के कुछ लोगों ने आगे बढ़कर मुनिका के पति की दूसरी शादी करवा दी, जिससे उसकी स्थिति और भी दयनीय हो गई।

इस अमानवीय कृत्य और सामाजिक बहिष्कार से त्रस्त होकर मुनिका ने न्याय की गुहार लगाई और छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। हाईकोर्ट की सिंगल बेंच ने मामले की गंभीरता को समझते हुए तत्काल प्रभाव से कांकेर के कलेक्टर, एसपी और डडसेना कलार समाज के संभागीय अध्यक्ष को नोटिस जारी कर जवाब तलब किया है।

मुनिका का मामला समाज में व्याप्त उन कुरीतियों को उजागर करता है, जिनसे आज भी महिलाओं को न्याय के लिए लंबी लड़ाई लड़नी पड़ती है। कानूनी कार्रवाई करने पर भी समाज का एक वर्ग पीड़िता और उसके परिवार पर सामाजिक और मानसिक दबाव बनाने में पीछे नहीं हटता।

यह मामला केवल मुनिका की व्यक्तिगत लड़ाई नहीं है, बल्कि उन अनगिनत महिलाओं की आवाज़ भी है, जो सामाजिक बहिष्कार और अन्याय के खिलाफ न्याय की आस लगाए हुए हैं। यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि हाईकोर्ट इस मामले में किस प्रकार का फैसला सुनाती है और क्या मुनिका को समाज में फिर से स्वीकार किया जाएगा या नहीं।

सामाजिक बहिष्कार जैसी प्रथाएं आधुनिक समाज में न केवल अवांछनीय हैं, बल्कि यह मानवाधिकारों के उल्लंघन का गंभीर मामला भी है। न्याय की इस लंबी लड़ाई में मुनिका और उसके परिवार को समाज में फिर से सम्मान और अधिकार दिलाना एक बड़ी चुनौती होगी, और यह मामला इस दिशा में महत्वपूर्ण कानूनी नजीर साबित हो सकता है।

अब, न्यायालय के आदेश और कार्रवाई का सभी को इंतजार है, ताकि मुनिका और उसकी बच्ची को एक सामान्य जीवन जीने का अधिकार प्राप्त हो सके और उन्हें समाज में सम्मानपूर्वक स्थान मिल सके।

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