Saturday, August 30, 2025
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भारत का संविधान मात्र एक कानूनी दस्तावेज नहीं है, बल्कि यह न्याय की दिशा में एक नैतिक मार्गदर्शक भी है…चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा…

बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में 26 नवंबर 2024 को संविधान दिवस के अवसर पर एक भव्य समारोह आयोजित किया गया। इस मौके पर भारत के संविधान के महत्व और इसकी भूमिका पर विशेष जोर दिया गया, जिसमें मुख्य अतिथि के रूप में छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा ने महत्वपूर्ण संबोधन दिया। समारोह का शुभारंभ दीप प्रज्वलन से हुआ, जिसके माध्यम से संविधान की मूल भावना को सम्मानित किया गया।

चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा ने अपने भाषण में संविधान की गहनता और इसके न्यायिक, सामाजिक, और नैतिक पहलुओं पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि भारत का संविधान मात्र एक कानूनी दस्तावेज नहीं है, बल्कि यह न्याय की दिशा में एक नैतिक मार्गदर्शक भी है। उन्होंने संविधान के निर्माता डॉ. भीमराव अंबेडकर और अन्य संविधान निर्माताओं के दृष्टिकोण की सराहना की, जिन्होंने एक ऐसे समाज की परिकल्पना की थी जहां हर नागरिक को समान अवसर प्राप्त हो, चाहे उसकी सामाजिक और आर्थिक पृष्ठभूमि कुछ भी हो।

चीफ जस्टिस ने विशेष रूप से संविधान में निहित मौलिक अधिकारों के महत्व पर जोर दिया, जो हर व्यक्ति को गरिमा के साथ जीवन जीने और अपनी स्वतंत्रता का उपयोग करने का अधिकार प्रदान करते हैं। उनका मानना था कि न्यायपूर्ण और समतामूलक समाज की स्थापना के लिए सिर्फ अधिकारों की बात करना पर्याप्त नहीं है, बल्कि हमें उनके प्रभावी कार्यान्वयन के लिए सामूहिक भागीदारी की भी आवश्यकता है।

उन्होंने संविधान के नीति-निर्देशक सिद्धांतों की चर्चा करते हुए कहा कि ये सिद्धांत राज्य को नागरिकों के बीच असमानताओं को कम करने और सामाजिक आर्थिक न्याय को सुनिश्चित करने के लिए मार्गदर्शन प्रदान करते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि संविधान का अनुच्छेद 39-ए निःशुल्क विधिक सहायता का प्रावधान करता है, जो राज्य का संवैधानिक दायित्व है, और इसे गरीबों के लिए एक दान के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

चीफ जस्टिस सिन्हा ने सभी को यह याद दिलाया कि राज्य को यह सुनिश्चित करना होगा कि गरीबों और जरूरतमंदों को दी जाने वाली विधिक सहायता गुणवत्तापूर्ण हो और यह केवल एक औपचारिकता मात्र न रहे। इसके साथ ही उन्होंने शिक्षा के महत्व को रेखांकित करते हुए कहा कि शिक्षा समाज को सशक्त और न्यायपूर्ण बनाने में सहायक होती है। उन्होंने शिक्षा को समतामूलक समाज की दिशा में एक महत्वपूर्ण साधन बताया, जो भविष्य की पीढ़ियों को उनके अधिकारों और जिम्मेदारियों से अवगत कराता है।

इस समारोह में उच्च न्यायालय के जस्टिस पार्थ प्रतीम साहू, जस्टिस रजनी दुबे, जस्टिस नरेश कुमार चनद्रवंशी, जस्टिस दीपक कुमार तिवारी, जस्टिस सचिन सिंह राजपूत , जस्टिस राकेश मोहन पाण्डेय, जस्टिस आर.के अग्रवाल, जस्टिस संजय कुमार जायसवाल, जस्टिस रविन्द्र कुमार अग्रवाल, जस्टिस अरविंद कुमार ‘वर्मा, जस्टिस वी.डी.गुरू, जस्टिस ए के. प्रसाद तथा रजिस्ट्र जनरल, रजिस्ट्री के अधिकारीगण, अधिवक्तागण आदि उपरिथित थे।

जस्टिस संजय के. अग्रवाल ने कहा कि संविधान का शासन सभी को विधि के समक्ष समानता और समान अवसर प्रदान करता है, जो एक न्यायपूर्ण समाज की स्थापना के लिए अनिवार्य है। न्यायमूर्ति संजय एस. अग्रवाल ने संविधान के अनुच्छेद 21-ए की चर्चा करते हुए राज्य के दायित्व को रेखांकित किया, जिसमें 14 वर्ष तक के सभी बच्चों को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा प्रदान करने की बात कही गई है।

वरिष्ठ अधिवक्ता फौजिया मिर्जा और अधिवक्ता सुरया कंवलकर डांगी ने भी इस समारोह में अपने विचार व्यक्त किए और संविधान के महत्व को रेखांकित किया। उन्होंने एक न्यायपूर्ण समाज की स्थापना में संविधान की भूमिका की सराहना की।

समारोह में उच्च न्यायालय के कई न्यायाधीश, अधिवक्ता और अधिकारी उपस्थित थे, जिन्होंने संविधान दिवस के अवसर पर भारतीय संविधान के मूल्यों और आदर्शों को संरक्षित रखने का संकल्प लिया।

संविधान दिवस का यह कार्यक्रम इस बात का स्मरण कराता है कि संविधान न केवल हमारे अधिकारों की सुरक्षा करता है, बल्कि हमें एक समतामूलक और न्यायपूर्ण समाज की दिशा में निरंतर प्रयासरत रहने की प्रेरणा भी देता है। न्यायपालिका, विधायिका, और नागरिकों की सक्रिय भागीदारी से ही हम एक ऐसे समाज का निर्माण कर सकते हैं, जिसमें सभी को समान अवसर और न्याय मिले।

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