बिलासपुर जिले के कोटा विधानसभा क्षेत्र में कांग्रेस के दो प्रमुख नेताओं—विधायक अटल श्रीवास्तव और कांग्रेस जिला अध्यक्ष विजय केसरवानी—के बीच चल रहा वार-पलटवार थमने का नाम नहीं ले रहा है। दोनों ही नेता एक-दूसरे पर संगठन को कमजोर करने और कांग्रेस की साख को नुकसान पहुंचाने के आरोप लगा रहे हैं।
विधायक अटल श्रीवास्तव के आरोप विधायक अटल श्रीवास्तव ने कांग्रेस जिला अध्यक्ष विजय केसरवानी पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि उनकी कार्यशैली पार्टी के लिए घातक साबित हो रही है। उन्होंने टिकट वितरण से लेकर निष्कासन की प्रक्रियाओं में गड़बड़ी का आरोप लगाया। अटल श्रीवास्तव ने यह भी कहा कि अगर विजय केसरवानी कांग्रेस भवन में हार की समीक्षा बैठक में शामिल होते हैं, तो उनके हजारों समर्थकों के सामने सारी सच्चाई उजागर हो जाएगी।
जिला अध्यक्ष विजय केसरवानी का पलटवार इस बयान के जवाब में कांग्रेस जिला अध्यक्ष विजय केसरवानी ने प्रेस विज्ञप्ति जारी कर अटल श्रीवास्तव को ही पार्टी की हार के लिए जिम्मेदार ठहराया। उन्होंने कहा कि विधायक कोटा विधानसभा क्षेत्र के भीतर कांग्रेस की दुर्दशा पर ध्यान देना चाहिए। उन्होंने आंकड़ों के साथ बताया कि कोटा क्षेत्र में कांग्रेस की स्थिति बेहद खराब हो चुकी है।
कोटा विधानसभा में कांग्रेस की हार के आंकड़े
- रत्नपुर नगर पालिका: कांग्रेस चौथे स्थान पर रही, बीजेपी से लगभग 2000 वोटों से हारी।
- गौरेला नगर पालिका: कांग्रेस तीसरे स्थान पर, बीजेपी से 5600 वोटों से पराजित।
- कोटा नगर पंचायत: कांग्रेस प्रत्याशी 3300 वोटों से हार गया।
- पेंड्रा नगर पालिका: कांग्रेस निर्दलीय प्रत्याशी से हार गई।
इसके अलावा, कोटा विधानसभा क्षेत्र में 60 वार्डों में से कांग्रेस केवल 18 वार्डों में ही जीत दर्ज कर पाई। केसरवानी ने सवाल उठाया कि इसकी जिम्मेदारी कौन लेगा—जिला अध्यक्ष या स्वयं विधायक?
कांग्रेस के लिए मुश्किल दौर कोटा विधानसभा क्षेत्र में कांग्रेस की लगातार होती हार और दोनों नेताओं के बीच खींचतान ने पार्टी के भीतर असंतोष को उजागर कर दिया है। जहां एक ओर विधायक अटल श्रीवास्तव संगठन की खामियों को उजागर कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर जिला अध्यक्ष विजय केसरवानी उनके नेतृत्व पर सवाल उठा रहे हैं।
क्या कांग्रेस इन मतभेदों को सुलझा पाएगी? आने वाले समय में कांग्रेस के लिए यह जरूरी होगा कि वह आंतरिक कलह को खत्म करे और संगठन को मजबूत करे। वरना, आने वाले चुनावों में यह अंदरूनी संघर्ष पार्टी के लिए और भी ज्यादा नुकसानदेह साबित हो सकता है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि कांग्रेस नेतृत्व जल्द ही इस विवाद को सुलझाने में असफल रहता है, तो यह पार्टी की जमीनी पकड़ को और कमजोर कर सकता है। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि कांग्रेस नेतृत्व इस समस्या का समाधान कैसे करता है और क्या कोटा विधानसभा क्षेत्र में पार्टी की स्थिति सुधारने के लिए कोई ठोस कदम उठाए जाते हैं या नहीं।