Saturday, August 30, 2025
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“हाईकोर्ट का स्पष्ट आदेश: अनुकंपा नियुक्ति केवल रियायत, अधिकार नहीं; नियुक्ति के बाद पद परिवर्तन या पदोन्नयन की मांग का नहीं होता कानूनी आधार”…

बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में स्पष्ट किया है कि अनुकंपा नियुक्ति किसी व्यक्ति का कानूनी अधिकार नहीं बल्कि केवल एक रियायत होती है। हाईकोर्ट ने कहा कि यदि नियुक्ति स्वीकार कर ली जाती है, तो बाद में पद परिवर्तन या पदोन्नयन की मांग का कोई वैधानिक आधार नहीं बनता। यह टिप्पणी न्यायमूर्ति राकेश मोहन पांडेय की एकलपीठ ने याचिकाकर्ता अभिनय दास मानिकपुरी की याचिका खारिज करते हुए की।

याचिकाकर्ता के पिता घनश्याम दास लोक निर्माण विभाग, धमतरी में चौकीदार के पद पर कार्यरत थे। 14 मार्च 2018 को उनके निधन के बाद अभिनय दास ने अनुकंपा नियुक्ति के लिए विभाग में आवेदन प्रस्तुत किया। विभाग ने प्रक्रिया पूर्ण कर उन्हें माली के पद पर नियुक्त करने का आदेश जारी किया। हालांकि, अभिनय दास ने चालक के पद पर नियुक्ति की मांग की और विभागाध्यक्ष से इसकी अनुशंसा भी करवाई।

इसके बावजूद, रिक्त पदों की उपलब्धता को ध्यान में रखते हुए विभाग ने उन्हें माली पद पर नियुक्त किया, जिसे उन्होंने 2020 में स्वीकार कर कार्यभार ग्रहण कर लिया। इसके पश्चात, उन्होंने योग्यता के आधार पर पद परिवर्तन कर चालक पद पर नियुक्त करने हेतु हाईकोर्ट में याचिका दायर की।

कोर्ट ने अपने निर्णय में कहा कि अनुकंपा नियुक्ति संवैधानिक या वैधानिक अधिकार नहीं है, बल्कि यह एक मानवीय दृष्टिकोण से दी गई छूट है। यदि कोई व्यक्ति इस नियुक्ति को स्वीकार करता है, तो बाद में पद में बदलाव की मांग न्यायिक हस्तक्षेप के योग्य नहीं होती, जब तक कि नियुक्ति में किसी प्रकार की कानूनी अनियमितता न हो। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि ऐसे मामलों में न्यायिक समीक्षा की सीमा अत्यंत संकीर्ण होती है।

न्यायालय के इस निर्णय के साथ ही याचिका खारिज कर दी गई, जिससे यह संदेश गया कि अनुकंपा नियुक्ति को लेकर की गई नियुक्ति प्रक्रिया और पद स्वीकृति के बाद उस पर प्रश्नचिह्न नहीं लगाया जा सकता।

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