छत्तीसगढ़ के बहुचर्चित शराब घोटाले में प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने एक बार फिर बड़ी कार्रवाई करते हुए तत्कालीन आबकारी आयुक्त आईएएस निरंजन दास समेत 31 आबकारी अधिकारियों की 38.21 करोड़ रुपये मूल्य की चल-अचल संपत्तियों को अस्थायी रूप से कुर्क कर लिया है। यह कार्रवाई धन शोधन निवारण अधिनियम (PMLA), 2002 के तहत की गई है। ईडी का दावा है कि इस संगठित घोटाले से राज्य के राजस्व को 2,800 करोड़ रुपये से अधिक का नुकसान हुआ है, जिसकी राशि आगे की जांच में और बढ़ सकती है।
ईडी की जांच में सामने आया है कि छत्तीसगढ़ आबकारी विभाग के भीतर वरिष्ठ अधिकारियों और राजनीतिक संरक्षण प्राप्त व्यक्तियों से जुड़ा एक संगठित आपराधिक सिंडिकेट सक्रिय था। इस सिंडिकेट ने विभाग की पूरी कार्यप्रणाली को अपने नियंत्रण में लेकर सरकारी नियमों और प्रक्रियाओं को दरकिनार करते हुए अवैध कमाई का जाल बिछाया।
जांच एजेंसी के अनुसार, तत्कालीन आबकारी आयुक्त निरंजन दास और तत्कालीन सीईओ अरुण पति त्रिपाठी ने मिलकर एक समानांतर आबकारी व्यवस्था स्थापित की थी। इसी समानांतर सिस्टम के जरिए शराब के उत्पादन, परिवहन और बिक्री में बड़े पैमाने पर अनियमितताएं की गईं।
ईडी की रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि सरकारी शराब दुकानों के माध्यम से तथाकथित ‘पार्ट-बी’ योजना चलाई जा रही थी। इस योजना के तहत अवैध देसी शराब का निर्माण और बिक्री की गई। नकली होलोग्राम, गैर-कानूनी बोतलों और लेबल का इस्तेमाल कर शराब को वैध दिखाया जाता था।
इसके अलावा, सरकारी गोदामों और तय आपूर्ति श्रृंखला को बायपास कर शराब सीधे अवैध भट्टियों से सरकारी दुकानों तक पहुंचाई जाती थी। यह पूरा नेटवर्क आबकारी विभाग के अधिकारियों की मिलीभगत से संचालित हो रहा था, जिससे सरकार को भारी राजस्व नुकसान हुआ।
ईडी के मुताबिक, इस घोटाले में आबकारी अधिकारियों को प्रति केस 140 रुपये का कमीशन दिया जाता था। जांच में यह भी सामने आया है कि अकेले तत्कालीन आयुक्त निरंजन दास ने 18 करोड़ रुपये से अधिक की अपराध से अर्जित आय हासिल की। वहीं, कुल 31 आबकारी अधिकारियों ने मिलकर करीब 89.56 करोड़ रुपये की अवैध कमाई की।
ईडी द्वारा कुर्क की गई संपत्तियों में आलीशान मकान, फ्लैट, प्लॉट, बैंक बैलेंस, निवेश और अन्य कीमती चल-अचल संपत्तियां शामिल हैं। जांच एजेंसी का कहना है कि ये सभी संपत्तियां शराब घोटाले से अर्जित अवैध धन से खरीदी गई थीं।
ईडी ने संकेत दिए हैं कि यह कार्रवाई केवल एक कड़ी है और आने वाले दिनों में इस मामले में और भी बड़े खुलासे हो सकते हैं। एजेंसी का मानना है कि शराब घोटाले की जड़ें काफी गहरी हैं और इसमें कई प्रभावशाली चेहरे भी जांच के दायरे में आ सकते हैं।
छत्तीसगढ़ का यह शराब घोटाला न केवल प्रशासनिक भ्रष्टाचार का बड़ा उदाहरण बनकर सामने आया है, बल्कि इसने सरकारी तंत्र में जवाबदेही और पारदर्शिता पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।


