बिलासपुर। निजी स्कूलों की मनमानी और शिक्षा व्यवस्था में बढ़ती अनियमितताओं के बीच एक बड़ा मामला सामने आया है, जिसने न सिर्फ स्थानीय स्तर बल्कि केंद्रीय स्तर तक हलचल मचा दी है। व्यापार विहार स्थित ब्रिलियंट पब्लिक स्कूल के खिलाफ अभिभावकों की गंभीर शिकायतों ने अब तूल पकड़ लिया है और मामला सीधे केंद्रीय राज्य मंत्री तक पहुंच गया है।
करीब 40 से अधिक अभिभावकों ने स्कूल प्रबंधन पर आरोप लगाया है कि पूरे शैक्षणिक सत्र के दौरान बच्चों को सीबीएसई पैटर्न के तहत पढ़ाई कराई गई, उसी आधार पर फीस वसूली गई और परीक्षा को लेकर भी यही भरोसा दिलाया गया। लेकिन सत्र के अंत में अचानक छात्रों को छत्तीसगढ़ बोर्ड (सीजी बोर्ड) की परीक्षा में बैठाने के लिए दबाव बनाया जा रहा है। यह बदलाव न सिर्फ अप्रत्याशित है, बल्कि छात्रों की तैयारी और भविष्य दोनों के साथ गंभीर खिलवाड़ के रूप में देखा जा रहा है।
मामले की गंभीरता को देखते हुए केंद्रीय राज्य मंत्री ने हस्तक्षेप करते हुए छत्तीसगढ़ शासन के मुख्य सचिव को पत्र लिखकर त्वरित और निष्पक्ष जांच की मांग की है। अपने पत्र में उन्होंने साफ तौर पर संकेत दिया है कि यह मामला सिर्फ प्रशासनिक लापरवाही नहीं, बल्कि अभिभावकों को गुमराह करने और शिक्षा व्यवस्था के साथ धोखाधड़ी का प्रतीत होता है। उन्होंने वरिष्ठ अधिकारियों की टीम बनाकर पूरे प्रकरण की गहराई से जांच कराने और दोषियों पर कड़ी कार्रवाई की बात कही है।
यह पूरा घटनाक्रम एक बड़े सवाल को जन्म देता है—क्या निजी स्कूलों पर नियामकीय नियंत्रण केवल कागजों तक सीमित रह गया है? क्या शिक्षा अब सेवा नहीं, बल्कि मुनाफे का माध्यम बनती जा रही है, जहां बच्चों का भविष्य सिर्फ एक ‘प्रोडक्ट’ बनकर रह गया है?
विशेषज्ञों का मानना है कि बोर्ड बदलने जैसे महत्वपूर्ण निर्णय का सीधा असर छात्रों के मानसिक दबाव, परीक्षा परिणाम और आगे की शैक्षणिक दिशा पर पड़ता है। ऐसे में यदि अभिभावकों के आरोप सही साबित होते हैं, तो यह केवल एक स्कूल की गलती नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम की विफलता मानी जाएगी।
अब निगाहें शासन की कार्रवाई पर टिकी हैं। क्या जांच महज औपचारिकता बनकर रह जाएगी या वास्तव में दोषियों पर सख्त कार्रवाई होगी? यह देखना अहम होगा। क्योंकि यह मामला सिर्फ एक स्कूल का नहीं, बल्कि उन सैकड़ों बच्चों के भविष्य का है, जिनके सपनों के साथ किसी भी तरह का समझौता स्वीकार नहीं किया जा सकता।



