Thursday, March 12, 2026
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पूर्व विधानसभा अध्यक्ष राजेंद्र प्रसाद शुक्ला की मृत्यु मामले में डॉक्टर नरेंद्र विक्रम यादव एवं अपोलो प्रबंधन पर एफआईआर दर्ज…

बिलासपुर: छत्तीसगढ़ विधानसभा के पूर्व अध्यक्ष एवं विधायक पंडित राजेंद्र प्रसाद शुक्ला की संदिग्ध परिस्थितियों में हुई मृत्यु के मामले ने एक बार फिर तूल पकड़ लिया है। इस प्रकरण में करीब दो दशक बाद बड़ा खुलासा हुआ है, जिसमें अपोलो अस्पताल बिलासपुर के डॉक्टर नरेंद्र विक्रमादित्य यादव एवं अस्पताल प्रबंधन के विरुद्ध गंभीर धाराओं के तहत आपराधिक मामला दर्ज किया गया है।

शिकायतकर्ता डॉ. प्रदीप शुक्ला, जो कि स्व. राजेंद्र प्रसाद शुक्ला के पुत्र हैं, ने थाना सरकंडा में शिकायत दर्ज कराते हुए बताया कि 2 अगस्त 2006 को उनके पिता को सांस लेने में तकलीफ होने पर अपोलो अस्पताल में भर्ती कराया गया था। वहां हृदय रोग विशेषज्ञ के रूप में कार्यरत डॉक्टर नरेंद्र विक्रमादित्य यादव ने उनका एंजियोग्राफी व एंजियोप्लास्टी किया। ऑपरेशन के कुछ ही घंटों के भीतर पंडित शुक्ला की तबीयत बिगड़ गई और उन्हें आईसीयू में भर्ती कर दिया गया। लगातार 18 दिनों तक इलाज के बाद उनकी मृत्यु हो गई।

प्रारंभिक समय में इस घटना को सामान्य चिकित्सकीय विफलता मानते हुए मामला रफा-दफा कर दिया गया था। लेकिन हाल ही में सामने आए तथ्यों के अनुसार डॉक्टर नरेंद्र विक्रमादित्य यादव, जो अब ‘नरेंद्र जॉन केम’ के नाम से दमोह के एक मिशन अस्पताल में पदस्थ थे, की डिग्री फर्जी पाई गई है। दमोह जिले में उनकी भूमिका को लेकर कई शिकायतें सामने आईं, जिसमें कई मरीजों की मौत का आरोप उन पर लगा। इन शिकायतों के बाद हुई जांच में यह सामने आया कि वह कार्डियोलॉजिस्ट के रूप में बिना मान्यता प्राप्त डिग्री के कार्य कर रहे थे।

आरोप है कि अपोलो अस्पताल प्रबंधन ने बिना पर्याप्त जांच-पड़ताल के डॉक्टर यादव को नियुक्त किया और उनके द्वारा की गई चिकित्सा प्रक्रिया से न केवल पंडित शुक्ला की जान गई, बल्कि अन्य कई मरीजों की जान भी जोखिम में पड़ी। इसके अलावा, अस्पताल ने विधानसभा से उपचार के नाम पर 20 लाख रुपये भी लिए थे।

इस मामले में डॉक्टर नरेंद्र विक्रमादित्य यादव एवं अपोलो अस्पताल प्रबंधन के विरुद्ध भारतीय दंड संहिता की धारा 420 (धोखाधड़ी), 465, 466, 468, 471 (जालसाजी), 304 (गैर इरादतन हत्या) और 34 (साझा आपराधिक साजिश) के तहत अपराध क्रमांक 563/2025 दर्ज कर लिया गया है। पुलिस मामले की विस्तृत जांच में जुट गई है।

इस प्रकरण ने न केवल चिकित्सा क्षेत्र में कार्यरत फर्जी डिग्रीधारकों पर सवाल खड़े किए हैं, बल्कि बड़े निजी अस्पतालों की नियुक्ति प्रक्रिया और नैतिकता पर भी गंभीर प्रश्नचिह्न लगा दिए हैं।

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