Tuesday, March 17, 2026
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सीबीएसई का नाम, भारी फीस और महंगी किताबें—बिलासपुर के नारायणा ई-टेक्नो स्कूल पर गंभीर आरोप, डीईओ ने बैठाई जांच…

बिलासपुर। शहर के नेहरू नगर स्थित नारायणा ईं-टेक्नो स्कूल की कार्यप्रणाली को लेकर बड़ा विवाद सामने आया है। आरोप है कि स्कूल प्रबंधन ने कक्षा 1 से 7–8 तक के विद्यार्थियों को सीबीएसई पाठ्यक्रम के नाम पर पढ़ाई कराते हुए अभिभावकों से भारी भरकम फीस वसूली, जबकि नियमानुसार इस स्तर पर सीबीएसई की मान्यता का प्रावधान ही नहीं होता। मामले के सामने आने के बाद जिला शिक्षा विभाग ने जांच शुरू कर दी है।

जिला शिक्षा अधिकारी विजय टांडे ने स्पष्ट किया है कि कक्षा 1 से 8 तक के स्कूलों का संचालन राज्य शासन और जिला शिक्षा विभाग के नियमों के तहत होता है। इस स्तर पर सीबीएसई की मान्यता नहीं दी जाती। सामान्यतः सीबीएसई की संबद्धता कक्षा 9 से 12 तक के लिए प्रदान की जाती है। उन्होंने बताया कि नारायणा ईं-टेक्नो स्कूल की ओर से अब तक सीबीएसई से संबद्धता का कोई आधिकारिक दस्तावेज विभाग को प्रस्तुत नहीं किया गया है। ऐसे में यदि स्कूल ने सीबीएसई के नाम पर पढ़ाई कराई है, तो यह जांच का विषय है।

अभिभावकों का आरोप है कि स्कूल में प्रवेश के नाम पर भारी शुल्क लिया जाता है। उनके अनुसार कक्षा 1 में प्रवेश के समय लगभग एक लाख रुपये तक का खर्च आता है। स्कूल द्वारा बताए गए शुल्क विवरण में आवेदन शुल्क 1000 रुपये, प्रवेश शुल्क 10 हजार रुपये, रिफंडेबल सिक्योरिटी या कौशन 5 हजार रुपये, ट्यूशन फीस 67 हजार 500 रुपये, वार्षिक शुल्क 7 हजार 500 रुपये, स्मार्ट क्लास शुल्क करीब 4 हजार रुपये और गतिविधि शुल्क लगभग 3 हजार 600 रुपये शामिल हैं। इन सभी मदों को मिलाकर कक्षा 1 के छात्र के लिए करीब एक लाख रुपये का खर्च सामने आता है, जबकि उच्च कक्षाओं में यह राशि और बढ़ जाती है।

जिला शिक्षा अधिकारी ने यह भी बताया कि कक्षा 1 से 8 तक के विद्यार्थियों को छत्तीसगढ़ पाठ्यपुस्तक निगम की किताबें निशुल्क उपलब्ध कराई जाती हैं। विभाग द्वारा कर्मचारियों के माध्यम से पूरे जिले के स्कूलों को किताबें वितरित की गई हैं। इसके बावजूद आरोप है कि नारायणा ईं-टेक्नो स्कूल में सरकारी किताबों के बजाय अलग और महंगी किताबें पढ़ाई गईं तथा अभिभावकों को एक तय दुकान से किताबें खरीदने के लिए कहा गया।

डीईओ विजय टांडे ने कहा कि यह भी जांच का विषय है कि जब विभाग ने किताबें उपलब्ध कराईं, तो स्कूल प्रबंधन ने उन्हें क्यों नहीं लिया और किस आधार पर अलग पाठ्यक्रम लागू किया गया। मामले को लेकर यह आशंका भी जताई जा रही है कि निजी स्कूलों और शिक्षा तंत्र के बीच मुनाफे को लेकर किसी तरह की साठगांठ हो सकती है, जिसकी जांच आवश्यक है।

इस मामले ने शिक्षा व्यवस्था पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। यदि कक्षा 1 से 8 तक का नियंत्रण जिला शिक्षा विभाग के पास है, तो इतने समय तक स्कूल में कौन-सा पाठ्यक्रम पढ़ाया जा रहा था और कितनी फीस वसूली जा रही थी, इसकी जानकारी विभाग को क्यों नहीं थी—यह भी एक बड़ा सवाल बन गया है।

बताया जाता है कि पूर्व में हाईकोर्ट ने भी निजी स्कूलों की फीस और पाठ्यक्रम व्यवस्था को लेकर स्पष्ट निर्देश दिए थे। इसके बावजूद अभिभावकों का आरोप है कि कई निजी स्कूल मनमाने तरीके से फीस वसूल रहे हैं और अपनी सुविधा के अनुसार पाठ्यक्रम लागू कर रहे हैं।

मामले की गंभीरता को देखते हुए जिला शिक्षा अधिकारी ने तीन सदस्यीय जांच समिति का गठन किया है। समिति को एक सप्ताह के भीतर अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत करने के निर्देश दिए गए हैं।

डीईओ विजय टांडे ने कहा कि यदि जांच में यह साबित होता है कि स्कूल ने नियमों के विपरीत फीस वसूली या गलत पाठ्यक्रम लागू किया है, तो विभाग के पास मान्यता रद्द करने तक की कार्रवाई करने का अधिकार है।

फिलहाल इस पूरे प्रकरण में अब सबकी निगाहें जांच समिति की रिपोर्ट और प्रशासन की अगली कार्रवाई पर टिकी हुई हैं, क्योंकि मामला सिर्फ फीस वसूली का नहीं बल्कि सैकड़ों बच्चों की पढ़ाई और अभिभावकों की आर्थिक स्थिति से भी जुड़ा हुआ है।

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