बिलासपुर/लेखक विशेष। लोकतंत्र के चार स्तंभों में से एक माने जाने वाले मीडिया की स्वतंत्रता पर जब भी सवाल उठते हैं, अदालतों की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है। बिलासपुर की एक महिला पत्रकार के खिलाफ छह साल पुराने आपराधिक मामले को छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट द्वारा खारिज किया जाना सिर्फ एक कानूनी फैसला नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों और प्रेस की स्वतंत्रता के पक्ष में दिया गया एक सशक्त संदेश भी है।
मामला वर्ष 2018 का है। एक महिला पत्रकार को सूचना मिली कि महिला थाना बिलासपुर में कुछ नर्सों और उनके पतियों को कथित तौर पर अवैध रूप से हिरासत में रखा गया है। एक पत्रकार के तौर पर तथ्यों की पड़ताल करना और जनता के सामने सच लाना उनका पेशेवर दायित्व था। लेकिन इसी दौरान पुलिस और पत्रकार के बीच विवाद की स्थिति बनी और पत्रकार के खिलाफ शासकीय कार्य में बाधा सहित विभिन्न धाराओं में अपराध दर्ज कर लिया गया।
सवाल यह नहीं है कि एफआईआर दर्ज हुई या नहीं। सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि मामला इतना गंभीर था तो पुलिस ने चार्जशीट दाखिल करने में पूरे छह साल क्यों लगा दिए? और यदि छह साल तक जांच एजेंसी स्वयं मामले को आगे नहीं बढ़ा सकी, तो क्या यह माना जाए कि आरोपों में पर्याप्त दम ही नहीं था?
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में इसी बिंदु को केंद्र में रखा। अदालत ने साफ कहा कि बिना किसी उचित कारण के छह साल तक चार्जशीट लंबित रखना संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत नागरिकों को प्राप्त “त्वरित न्याय के अधिकार” का उल्लंघन है। यह टिप्पणी केवल इस मामले तक सीमित नहीं है, बल्कि उन तमाम मामलों के लिए चेतावनी है जहां जांच एजेंसियों की लापरवाही या प्रशासनिक सुस्ती के कारण लोगों का जीवन वर्षों तक कानूनी अनिश्चितता में फंसा रहता है।
और भी महत्वपूर्ण बात यह है कि अदालत ने माना कि एक पत्रकार के खिलाफ उसकी पेशेवर जिम्मेदारी निभाने के दौरान इस प्रकार की कार्यवाही को जारी रखना न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग माना जा सकता है। यह टिप्पणी इसलिए भी अहम है क्योंकि अक्सर देखा गया है कि सत्ता, प्रशासन या प्रभावशाली संस्थानों से जुड़े मामलों की पड़ताल करने वाले पत्रकार कानूनी दबाव, मुकदमों और प्रताड़ना का सामना करते हैं।
हाईकोर्ट का यह फैसला सिर्फ श्रिया पांडेय की व्यक्तिगत जीत नहीं है। यह उन सभी पत्रकारों के लिए राहत और भरोसे का संदेश है जो जनहित के मुद्दों पर रिपोर्टिंग करते हैं। अदालत ने यह स्पष्ट कर दिया कि प्रशासनिक अक्षमता या संस्थागत शिथिलता किसी नागरिक के मौलिक अधिकारों को कुचलने का आधार नहीं बन सकती।
इस फैसले के बाद एक बड़ा प्रश्न पुलिस और जांच एजेंसियों के सामने भी खड़ा होता है। यदि छह साल तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई, तो इस देरी के लिए जवाबदेह कौन है? क्या ऐसी लापरवाही पर भी कोई जवाबदेही तय होगी? क्योंकि न्याय में देरी केवल आरोपी के लिए ही नहीं, बल्कि पूरी न्याय व्यवस्था की विश्वसनीयता के लिए भी नुकसानदेह होती है।
बिलासपुर हाईकोर्ट का यह निर्णय लोकतंत्र में प्रेस की भूमिका, नागरिक अधिकारों और न्यायिक जवाबदेही के पक्ष में एक मजबूत हस्तक्षेप के रूप में देखा जाएगा। यह फैसला याद दिलाता है कि कानून का उद्देश्य नागरिकों को डराना नहीं, बल्कि उनके अधिकारों की रक्षा करना है। और जब व्यवस्था अपने दायित्वों से भटकती है, तब न्यायपालिका ही वह मंच बनती है जो संविधान की आत्मा को जीवित रखती है।


