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शरीर, मन और आत्मा की शुद्धि का पर्व है छठ

शरीर, मन और आत्मा की शुद्धि का पर्व है छठ

छठ महापर्व शरीर, मन और आत्मा की शुद्धि का पर्व है। वैदिक मान्यता है कि नहाए-खाए से सप्तमी के पारण तक उन भक्तों पर षष्ठी माता की कृपा बरसती जो श्रद्धापूर्वक व्रत करते हैं। सूर्य षष्ठी का व्रत आरोग्य की प्राप्ति, सौभाग्य और संतान के लिए रखा जाता है।
स्कंद पुराण के अनुसार राजा प्रियवृत ने भी यह व्रत रखा था। उन्हें कुष्ठ रोग हो गया था। भगवान भास्कर से इस रोग की मुक्ति के लिए उन्होंने छठ व्रत किया था। स्कंद पुराण में प्रतिहार षष्ठी के तौर पर इस व्रत की चर्चा की गई है। वर्षकृत्यम में भी छठ की चर्चा है। सूर्य को अर्घ्य देने से कई जन्मों के पाप नष्ट हो जाते हैं।
प्रकृति ही षष्ठी माता हैं। निसंतान को संतान देती हैं और संतान की रक्षा करती हैं। भगवान भास्कर की मानस बहन है षष्ठी देवी अथर्ववेद के अनुसार षष्ठी देवी भगवान भास्कर की मानस बहन हैं। प्रकृति के छठे अंश से षष्ठी माता उत्पन्न हुई हैं। उन्हें बच्चों की रक्षा करने वाले भगवान विष्णु द्वारा रची माया भी माना जाता है। इसीलिए बच्चे के जन्म के छठे दिन छठी पूजी जाती है, ताकि बच्चे के ग्रह-गोचर शांत हो जाएं। एक अन्य मान्यता के अनुसार कार्तिकेय की शक्ति हैं षष्ठी देवी।

ब्रह्मा की बेटी हैं छठ माता

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार छठ माता ब्रह्मा की बेटी हैं। इनका पालन-पोषण इंद्र देव ने किया। इन्होंने असुरों से देवताओं की रक्षा की, इसलिए उन्हें देवसेना भी कहा जाता है। छठ माता का विवाह भगवान शिव के बड़े पुत्र कार्तिकेय से हुआ। इसलिए कहा जाता है कि स्वर्ग, माता का मायका है और कैलाश में ससुराल। छठ माता सूर्य की किरणों की सवारी करती हैं। इस कारण उगते और डूबते सूर्य की आराधना से श्रद्धालुओं को छठी मइया की कृपा मिलती है।

खरना प्रसाद से दूर होते हैं कई कष्ट

चरक संहिता में बताया गया है कि खरना के प्रसाद में ईख के कच्चे रस, गुड़ के सेवन से त्वचा रोग, आंख की पीड़ा, शरीर के दाग-धब्बे समाप्त हो जाते हैं।

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