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सुप्रीम कोर्ट ने अटॉर्नी जनरल से पूछा- भीड़ में शामिल लोगों पर हत्या का मामला दर्ज करना कितना सही…

सुप्रीम कोर्ट ने सीआरपीसी की गैरकानूनी सभा (धारा-149) की संवैधानिक वैधता का परीक्षण करने का निर्णय लिया है। वास्तव में सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर कर कहा गया है कि इस धारा का इस्तेमाल हत्या जैसे संगीन अपराध में परिवार या समूह के सदस्यों को फंसाने के लिए किया जाता है जिससे कि उन्हें कठोर सजा मिले। न्यायमूर्ति इंदिरा बनर्जी और न्यायमूर्ति अजय रस्तोगी की पीठ ने विक्रम द्वारा दायर इस याचिका पर अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल को नोटिस जारी किया है। विक्रम को गैरकानूनी सभा का हिस्सा होने के कारण हत्या के मामले में दोषी ठहराया जा चुका है।

याचिकाकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ वकील सुशील कुमार जैन की ओर से कहा गया कि अभियोजन पक्ष द्वारा अक्सर सार्वजनिक शांति भंग करने का अपराध आरोपियों पर लगाया जाता है। यहां तक कि दो परिवार या समूह के निजी झगड़ों के मामले में इसका इस्तेमाल किया जाता है।

याचिका में यह दावा किया गया है कि यह धारा-149, संविधान के अनुच्छेद-14, 19 और 21 का उल्लंघन है। यहां तक भी आरोपियों की भूमिका स्पष्ट न होने के बावजूद उन्हें जबरन इस अपराध में शामिल किया जाता है।

ग्रामीण परिवेश में लोग आमतौर पर लाठी, फरसा, कुल्हाड़ी आदि अपने साथ रखते हैं। किसी बहस के दौरान गठित किसी अपराध में महज भीड़ का हिस्सा होने के कारण लोगों को आरोपी बना दिया जाता है, जबकि अपराध में उनकी भूमिका कुछ भी नहीं होती है।

याचिका में यह भी कहा गया कि धारा-149 ब्रिटिश काल की देन है। स्वतंत्रता संग्राम को दबाने के लिए अंग्रेजों द्वारा इस धारा का इस्तेमाल किया जाता था। इस कानून में अब तक संशोधन नहीं हुआ और न ही इस पर परीक्षण करने का निर्णय लिया गया।

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