Saturday, August 30, 2025
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बिलासपुर: छत्तीसगढ़ का एकमात्र मानसिक स्वास्थ्य केंद्र बना अव्यवस्थाओं का शिकार, स्टाफ की भारी कमी और मूलभूत सुविधाओं के अभाव…

बिलासपुर, छत्तीसगढ़ — राज्य का एकमात्र मानसिक चिकित्सालय, जो वर्ष 2013 में राज्य सरकार द्वारा स्थापित किया गया था, आज एक दशक बाद भी बुनियादी सुविधाओं की कमी और प्रशासनिक अव्यवस्थाओं से जूझ रहा है। बिलासपुर के सेंदरी स्थित इस अस्पताल में स्टाफ की भारी कमी और सुविधाओं के अभाव ने मरीजों और उनके परिजनों की परेशानी बढ़ा दी है।

स्टाफ की भारी कमी

अस्पताल में डॉक्टर, नर्स, वार्ड बॉय, आया और मनोचिकित्सकों सहित कुल 73 पद रिक्त पड़े हैं। इस कमी के चलते न केवल भर्ती मरीजों की देखभाल प्रभावित हो रही है, बल्कि ओपीडी में आने वाले 150 से अधिक मरीजों को भी समय पर इलाज नहीं मिल पा रहा है। वर्तमान में अस्पताल में करीब 170 मरीज भर्ती हैं, जबकि इसकी क्षमता 200 बिस्तरों की है।

अधीक्षक की सफाई और जमीनी हकीकत

अस्पताल के अधीक्षक डॉ. प्रभु चौधरी का कहना है कि अस्पताल में किसी प्रकार की अव्यवस्था नहीं है और मरीजों को कोई परेशानी नहीं हो रही। हालांकि, अस्पताल का दौरा कर मरीजों और उनके परिजनों से बातचीत की, तो स्थिति इसके बिल्कुल विपरीत नजर आई।

परिजनों की व्यथा

प्रदेश और अन्य राज्यों से आए मरीजों के परिजनों ने अस्पताल प्रबंधन पर गंभीर आरोप लगाए हैं। उनका कहना है कि—

  • भोजन मेन्यू के अनुसार नहीं दिया जाता।
  • रुकने की व्यवस्था सीमित है — केवल दो कमरे, जिनमें 10-10 बेड हैं।
  • भोजन पकाने की कोई उचित व्यवस्था नहीं — परिजनों को स्वयं लकड़ी जलाकर ईंट के चूल्हे में खाना बनाना पड़ता है।
  • गंदगी की भरमार — शेड की सफाई परिजनों द्वारा की जाती है क्योंकि सफाईकर्मी नहीं हैं।

संसाधनों और विस्तार की योजना

राज्य सरकार द्वारा अस्पताल की क्षमता 100 बिस्तरों तक और बढ़ाने तथा विशेषज्ञ डॉक्टरों की नियुक्ति की योजना बनाई गई है, लेकिन भर्ती प्रक्रिया की कोई समयसीमा अब तक तय नहीं की गई है। ओपन और क्लोज वार्ड की व्यवस्था के तहत जिन मरीजों के परिजन नहीं हैं, उनकी देखभाल और भी चुनौतीपूर्ण हो जाती है।

प्रशासनिक बयान

अस्पताल प्रशासन का कहना है कि—

“हम लगातार रिक्त पदों की जानकारी उच्च अधिकारियों को भेज रहे हैं। सरकार ने विस्तार की योजना बनाई है, उम्मीद है जल्द सुधार होगा।”

“हम प्रयास कर रहे हैं कि जरूरी स्टाफ की जल्द से जल्द भर्ती हो सके। मरीजों की संख्या के अनुरूप सुविधाएं बढ़ाई जाएंगी।”

छत्तीसगढ़ के इस एकमात्र मानसिक चिकित्सालय की दशा एक गंभीर चिंतन का विषय है। जहां मानसिक स्वास्थ्य को लेकर देशभर में जागरूकता बढ़ रही है, वहीं यह संस्थान खुद मूलभूत सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रहा है। यदि शीघ्र ही प्रशासनिक और संसाधन संबंधी समस्याओं का समाधान नहीं किया गया, तो यह न केवल मरीजों के स्वास्थ्य बल्कि उनके अधिकारों का भी उल्लंघन होगा।

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