Friday, August 29, 2025
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हाईकोर्ट ने सीपत ट्रांसपोर्ट एसोसिएशन की जनहित याचिका की खारिज, ₹50,000 का लगाया जुर्माना…

बिलासपुर, 22 अगस्त – छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने क्षेत्रीय ट्रांसपोर्टर वेलफेयर एसोसिएशन, Sipat द्वारा दायर जनहित याचिका (PIL) को खारिज करते हुए इसे व्यक्तिगत स्वार्थ से प्रेरित बताया। अदालत ने इस दुरुपयोग पर कठोर रुख अपनाते हुए याचिकाकर्ता पर ₹50,000 का प्रतिकूल लागत (Exemplary Cost) लगाया और राशि को राज्य की विशेष दत्तक ग्रहण एजेंसियों (SAA) को जमा कराने का निर्देश दिया।

संघ ने अपने अध्यक्ष शत्रुघ्न कुमार लस्कर के माध्यम से याचिका दाखिल कर एनटीपीसी Sipat से निकलने वाले फ्लाई ऐश ट्रकों की ओवरलोडिंग पर रोक लगाने और प्रदूषण नियंत्रण हेतु तिरपाल से ढककर परिवहन सुनिश्चित करने की मांग की थी। साथ ही, Sipat–बिलासपुर–बलौदा मार्ग पर मोटरयान अधिनियम के कड़ाई से पालन की भी गुहार लगाई गई थी।

मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति रविन्द्र कुमार अग्रवाल की खंडपीठ ने याचिका की नीयत पर गंभीर सवाल उठाए। अदालत ने पाया कि याचिकाकर्ता स्वयं ट्रांसपोर्ट व्यवसाय से जुड़ा है और एनटीपीसी के परिवहन ठेकों में उसकी प्रत्यक्ष व्यावसायिक रुचि है।
न्यायालय ने रिकॉर्ड से यह भी स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ता ने पहले अधिकारियों को पत्र लिखकर “स्थानीय परिवहनकर्ताओं को प्राथमिकता” और “भाड़ा दर तय करने” जैसी मांगें की थीं। इससे अदालत ने निष्कर्ष निकाला कि यह याचिका जनहित नहीं बल्कि निजी व्यापारिक प्रतिस्पर्धा का परिणाम है।

अदालत ने यह भी उल्लेख किया कि इसी विषय पर W.P.(PIL) No. 37/2024 पहले से लंबित है, जिसमें अदालत ने स्वतः संज्ञान (suo motu) लिया हुआ है। इसके बावजूद, समानांतर याचिका दाखिल कर न्यायालय का समय बर्बाद किया गया।

हाईकोर्ट ने यह भी दर्ज किया कि जुलाई 2025 में याचिकाकर्ता के खिलाफ एक एफआईआर दर्ज हुई थी, जिसमें उस पर एनटीपीसी से जुड़े गिट्टी परिवहन वाहनों को रोकने, चालकों को धमकाने और कानून-व्यवस्था बिगाड़ने के आरोप लगाए गए थे। इस तथ्य को याचिका में छिपाना अदालत की नजर में उसकी विश्वसनीयता पर गंभीर प्रश्न खड़ा करता है।

अदालत की टिप्पणी

पीठ ने कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा—

“जनहित याचिका गरीब और वंचित वर्गों के अधिकारों की रक्षा का औजार है, न कि निजी बदले या व्यापारिक प्रतिद्वंद्विता का हथियार। ऐसी निरर्थक याचिकाएं अदालत के बहुमूल्य समय की बर्बादी करती हैं और इस असाधारण अधिकार क्षेत्र की पवित्रता को आघात पहुंचाती हैं।”

अदालत का फैसला

  • याचिका को प्रारंभिक स्तर पर ही खारिज कर दिया गया।
  • याचिकाकर्ता पर ₹50,000 का लागत लगाया गया, जिसे गरियाबंद और बलौदा की विशेष दत्तक ग्रहण एजेंसियों (SAA) को जमा कराना होगा।
  • याचिकाकर्ता द्वारा जमा की गई सुरक्षा राशि भी जब्त कर ली गई।

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