बिलासपुर, छत्तीसगढ़।
विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) द्वारा हाल ही में लागू किए गए ‘इक्विटी एवं भेदभाव निवारण’ संबंधी नए नियम अब देशभर में बहस और असंतोष का कारण बनते जा रहे हैं। छत्तीसगढ़ के बिलासपुर जिले में इन नियमों को लेकर सामान्य वर्ग के जागरूक नागरिकों ने खुलकर विरोध दर्ज कराया है। छात्रों का आरोप है कि समानता के नाम पर बनाए गए ये नियम स्वयं भेदभाव को जन्म दे रहे हैं।
पूर्व पार्षद प्रलय शर्मा (राजा) के नेतृत्व में एक प्रतिनिधिमंडल ने प्रधानमंत्री के नाम ज्ञापन सौंपते हुए इन नियमों को तत्काल प्रभाव से स्थगित करने की मांग की। यह ज्ञापन कलेक्टर कार्यालय के माध्यम से प्रेषित किया गया, जिस पर दर्जनों के हस्ताक्षर हैं।
प्रदर्शनकारियों का कहना है कि UGC का उद्देश्य भले ही शिक्षा परिसरों में भेदभाव को समाप्त करना हो, लेकिन नियमों की वर्तमान संरचना सामान्य वर्ग के छात्रों को शिकायतकर्ता के रूप में ही हाशिए पर डाल देती है। इससे न केवल संवैधानिक समानता प्रभावित होती है, बल्कि सामाजिक समरसता पर भी खतरा उत्पन्न हो रहा है।
ज्ञापन में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि ये नियम भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 — कानून के समक्ष समानता — का उल्लंघन करते हैं। छात्रों का तर्क है कि कानून और नियम सभी नागरिकों के लिए समान होने चाहिए, न कि किसी एक वर्ग विशेष के लिए।
विरोध कर रहे छात्रों के अनुसार, नए नियमों में प्रस्तावित शिकायत निवारण तंत्र (Grievance Redressal Mechanism) ऐसा बनाया गया है, जिसमें सामान्य वर्ग के छात्रों की शिकायतों को प्रभावी रूप से सुना ही नहीं जा रहा। इसे Natural Justice यानी प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के विरुद्ध बताया गया है।
झूठे आरोपों की आशंका
ज्ञापन में इस बात पर भी गंभीर चिंता जताई गई है कि बिना संतुलित सुरक्षा प्रावधानों के, इन नियमों का दुरुपयोग किया जा सकता है। छात्रों का कहना है कि झूठे या मनगढ़ंत आरोपों के चलते निर्दोष विद्यार्थियों का शैक्षणिक करियर और मानसिक स्वास्थ्य दोनों प्रभावित हो सकते हैं।
प्रमुख मांगें
ज्ञापन के माध्यम से सरकार और UGC से निम्नलिखित मांगें रखी गई हैं—
- UGC के नए नियमों को तत्काल प्रभाव से स्थगित किया जाए
- नियमों की संवैधानिक समीक्षा कराई जाए
- ‘भेदभाव’ की परिभाषा सभी वर्गों के लिए समान हो
- झूठे आरोपों से बचाव हेतु कड़े दंडात्मक प्रावधान जोड़े जाएं
सामाजिक समरसता पर मंडराता खतरा
छात्रों ने चेतावनी दी है कि शिक्षा संस्थान समाज को जोड़ने का माध्यम होते हैं, न कि विभाजन का। यदि नियमों के ज़रिए छात्रों को वर्गों में बांटा गया, तो इससे आपसी अविश्वास, तनाव और टकराव बढ़ सकता है, जिसका दीर्घकालिक प्रभाव राष्ट्रहित के विरुद्ध होगा।
अब सरकार की बारी
बिलासपुर से उठा यह विरोध केवल एक जिले तक सीमित नहीं माना जा रहा, बल्कि इसे देशभर में उभरती असहमति की आवाज़ के रूप में देखा जा रहा है। अब यह देखना अहम होगा कि केंद्र सरकार और UGC इस संवेदनशील मुद्दे पर क्या रुख अपनाते हैं — संवाद, संशोधन या टकराव।


