बिलासपुर।
छत्तीसगढ़ की न्यायधानी बिलासपुर के जिला मुख्यालय स्थित पुराना कंपोजिट बिल्डिंग में इन दिनों व्यवस्थाओं को लेकर सवाल उठने लगे हैं। इसी भवन में रजिस्ट्री कार्यालय सहित कई महत्वपूर्ण शासकीय विभाग संचालित हो रहे हैं, जहां प्रतिदिन बड़ी संख्या में आम नागरिक अपने जरूरी कार्यों के लिए पहुंचते हैं। जमीन-जायदाद की रजिस्ट्री, प्रमाण पत्र, प्रशासनिक कार्य और अन्य शासकीय प्रक्रियाओं के चलते यहां लोगों की लगातार आवाजाही बनी रहती है।
भवन तक पहुंचने के लिए दो प्रमुख मार्ग निर्धारित हैं। यातायात को सुचारू बनाए रखने और जाम की स्थिति से बचने के उद्देश्य से प्रशासन द्वारा मुख्य मार्ग पर कार, मोटरसाइकिल और अन्य वाहनों को खड़ा करने पर रोक लगाई गई है, ताकि आवागमन बाधित न हो। लेकिन जमीनी हकीकत इससे अलग नजर आती है। एक मार्ग पर अव्यवस्थित ढंग से खड़ी गाड़ियों के कारण हालात ऐसे बन जाते हैं कि पैदल चलना भी मुश्किल हो जाता है।

यह स्थिति सामान्य लोगों के लिए तो असुविधाजनक है ही, लेकिन बुजुर्गों और दिव्यांगजनों के लिए बेहद कष्टदायक साबित हो रही है। जिला मुख्यालय जैसे महत्वपूर्ण परिसर में रोजाना कई वरिष्ठ नागरिक और दिव्यांगजन अपने कार्यों के लिए पहुंचते हैं। वाहन दूर खड़ा करने की बाध्यता के चलते उन्हें लंबी दूरी पैदल तय करनी पड़ती है, जो उनके लिए किसी चुनौती से कम नहीं।
सबसे बड़ी चिंता का विषय यह है कि भवन परिसर में मूलभूत सुविधाओं का अभाव साफ दिखाई देता है। व्हीलचेयर, रैंप, हैंडरेल, बैठने की पर्याप्त व्यवस्था या विशेष सहायता काउंटर जैसी सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं। कई बुजुर्गों को अपने परिजनों या परिचितों के सहारे ही कार्यालय तक पहुंचना पड़ता है। जिनके साथ कोई नहीं होता, उनके लिए यह प्रक्रिया और भी कठिन हो जाती है।

सरकारें दिव्यांगजनों और वरिष्ठ नागरिकों के अधिकारों को लेकर विभिन्न योजनाओं और सुविधाओं का दावा करती रही हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर ऐसी व्यवस्थाओं की कमी प्रशासनिक संवेदनशीलता पर सवाल खड़े करती है। स्थानीय नागरिकों का मानना है कि जिला मुख्यालय जैसे महत्वपूर्ण स्थान पर विशेष व्यवस्था अनिवार्य रूप से की जानी चाहिए।
प्रवेश द्वार तक सीमित वाहनों को अनुमति देने, सुव्यवस्थित पार्किंग की व्यवस्था करने, रैंप और व्हीलचेयर उपलब्ध कराने, हेल्प डेस्क स्थापित करने तथा जरूरतमंदों के लिए सहायक कर्मियों की तैनाती जैसे कदम इस समस्या का व्यावहारिक समाधान हो सकते हैं। यदि जिला प्रशासन इस दिशा में ठोस और संवेदनशील पहल करता है, तो न केवल बुजुर्गों और दिव्यांगजनों को राहत मिलेगी, बल्कि यह एक समावेशी और जनहितैषी प्रशासन की मिसाल भी बनेगी।
अब देखना यह है कि जिम्मेदार अधिकारी इस गंभीर समस्या पर कब तक संज्ञान लेते हैं और पुराना कंपोजिट बिल्डिंग को वास्तव में जनसुविधा के अनुरूप बनाने की दिशा में क्या ठोस कदम उठाए जाते हैं।


