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5 एकड़ जमीन पर मचा बवाल, NSUI के दबाव में GGU ने पलटा फैसला, रंजीत बोले—सिर्फ निर्णय रद्द करना काफी नहीं, कुलपति बताएं आखिर किसके इशारे पर चला पूरा खेल?…

बिलासपुर। गुरु घासीदास केंद्रीय विश्वविद्यालय की करीब 5 एकड़ जमीन अग्रवाल समाज को दिए जाने के प्रस्ताव ने अब तूल पकड़ लिया है। NSUI के जोरदार विरोध और आंदोलन के बाद विश्वविद्यालय प्रशासन ने संबंधित निर्णय/प्रस्ताव को अपास्त कर दिया है। हालांकि, फैसला वापस होने के बाद भी विवाद थमता नजर नहीं आ रहा। NSUI ने अब सीधे कुलपति से जवाब मांगते हुए सवाल खड़ा किया है कि आखिर विश्वविद्यालय की जमीन किसी बाहरी सामाजिक संस्था को देने का प्रस्ताव आया ही क्यों और इसके पीछे पूरी प्रक्रिया क्या थी?

NSUI जिला अध्यक्ष रंजीत सिंह के नेतृत्व में छात्र प्रतिनिधिमंडल सोमवार को विश्वविद्यालय पहुंचा और जमीन आवंटन के मुद्दे पर अपना विरोध दर्ज कराया। NSUI का कहना है कि विश्वविद्यालय की जमीन विद्यार्थियों की वर्तमान और भविष्य की शैक्षणिक जरूरतों के लिए सुरक्षित रहनी चाहिए। विश्वविद्यालय में छात्रावास, प्रयोगशालाएं, पुस्तकालय, खेल सुविधाएं, नए विभाग और शोध केंद्र जैसी सुविधाओं के विस्तार की आवश्यकता है। ऐसे में इतनी बड़ी भूमि को गैर-शैक्षणिक उपयोग के लिए देने का प्रस्ताव गंभीर सवाल खड़े करता है।

मुख्य गेट पर रोके गए कार्यकर्ता, प्रशासनिक भवन में भी बंद हुए दरवाजे

NSUI प्रतिनिधिमंडल जब विश्वविद्यालय पहुंचा तो कार्यकर्ताओं को मुख्य गेट पर रोक दिया गया। इसके बाद प्रतिनिधिमंडल प्रशासनिक भवन पहुंचा, जहां गेट बंद कर दिए गए। इससे परिसर में काफी देर तक तनाव और गहमागहमी का माहौल बना रहा। कार्यकर्ताओं ने कुलपति के खिलाफ जमकर नारेबाजी करते हुए अपना विरोध दर्ज कराया।

NSUI का आरोप है कि काफी देर तक ज्ञापन लेने के लिए कोई अधिकारी मौके पर नहीं पहुंचा। इसके बाद कार्यकर्ताओं ने प्रशासनिक भवन के दोनों गेट तोड़ दिए। स्थिति को देखते हुए अधिष्ठाता छात्र कल्याण मेहता ने राष्ट्रपति के नाम NSUI का ज्ञापन स्वीकार किया। इसके बाद आंदोलन समाप्त किया गया।

फैसला वापस हुआ, लेकिन सवाल अभी बाकी

NSUI जिलाध्यक्ष रंजीत सिंह ने कहा कि संबंधित प्रस्ताव भले ही अब अपास्त कर दिया गया है, लेकिन इससे पूरे मामले पर पर्दा नहीं डाला जा सकता। उन्होंने कहा कि यह सिर्फ जमीन का मामला नहीं, बल्कि विश्वविद्यालय की संपत्ति और विद्यार्थियों के भविष्य से जुड़ा गंभीर विषय है।

उन्होंने मांग की कि जमीन से संबंधित पूरी फाइल, प्रस्ताव, बैठक की कार्यवाही और निर्णय लेने की प्रक्रिया की जांच कराई जाए। साथ ही कुलपति से लिखित स्पष्टीकरण लिया जाए कि प्रस्ताव किस आधार पर तैयार किया गया और विश्वविद्यालय की जमीन को इस उद्देश्य के लिए देने की जरूरत क्यों महसूस हुई।

रंजीत सिंह ने कहा, “सिर्फ फैसला वापस होना पर्याप्त नहीं है। जिस प्रक्रिया के तहत यह प्रस्ताव सामने आया, उसकी भी जवाबदेही तय होनी चाहिए। विद्यार्थियों और बिलासपुर की जनता को यह जानने का पूरा अधिकार है कि विश्वविद्यालय की जमीन को लेकर ऐसा निर्णय किस आधार पर लिया गया।”

कुलपति पर गंभीर आरोप, पुराने विवाद भी उठाए

रंजीत सिंह ने कुलपति आलोक चक्रवाल पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि वे आरएसएस के हिसाब से काम कर रहे हैं और उनके इशारों पर विश्वविद्यालय में नीतियां संचालित की जा रही हैं। उन्होंने यह भी कहा कि कुलपति का निर्धारित कार्यकाल समाप्त हो चुका है और वे फिलहाल एक्सटेंशन पर कार्यरत हैं।

NSUI ने कुलपति के कार्यकाल के दौरान छात्रहित से जुड़े विभिन्न विवादों का भी उल्लेख किया। इनमें छात्र की मृत्यु से जुड़ा मामला, विद्यार्थियों पर अनुशासनात्मक कार्रवाई, छात्र एवं छात्र नेताओं के खिलाफ पुलिस प्रकरण तथा शिक्षकों और विद्यार्थियों के साथ व्यवहार को लेकर उठे विवाद शामिल हैं। NSUI का कहना है कि विश्वविद्यालय प्रशासन और विद्यार्थियों के बीच संवाद और विश्वास का माहौल मजबूत होना चाहिए।

समाज विशेष के खिलाफ नहीं, जमीन के इस्तेमाल पर आपत्ति

NSUI ने साफ किया कि उसका विरोध किसी समाज विशेष के खिलाफ नहीं है। संगठन ने कहा कि सभी समाजों का सम्मान है और विवाद का केंद्र केवल विश्वविद्यालय की जमीन को गैर-शैक्षणिक उद्देश्य के लिए दिए जाने का प्रस्ताव है।

रंजीत सिंह ने कहा, “विश्वविद्यालय की एक-एक इंच जमीन विद्यार्थियों के भविष्य की धरोहर है। NSUI छात्रहित और विश्वविद्यालय की संपत्ति की रक्षा के लिए आगे भी मजबूती से आवाज उठाती रहेगी।”

इस पूरे घटनाक्रम के बाद अब निगाहें विश्वविद्यालय प्रशासन पर हैं। प्रस्ताव अपास्त होने से तत्काल विवाद भले ही शांत हो गया हो, लेकिन 5 एकड़ जमीन का प्रस्ताव किसने रखा, किस स्तर पर मंजूरी की प्रक्रिया चली और इसकी जरूरत क्यों पड़ी—इन सवालों का जवाब अब विश्वविद्यालय प्रशासन को देना होगा।

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