बिलासपुर। सात दिन, 19 फर्में, 15 विधिक नमूने, 117 किलो मिठाई नष्ट, दो प्रतिष्ठान बंद — यह रिपोर्ट कार्ड ‘बने खाबो, बने रहिबो 2.0’ का है। सरकारी विज्ञप्ति के शब्दों में यह अभियान ‘सफल’ रहा। लेकिन क्या यह सफलता जनता की थाली में उतरी है, या सिर्फ कागजों में कैद होकर रह गई? यह सवाल इसलिए और भी तीखा हो जाता है क्योंकि ठीक पहले ही कई निलंबित दुकानों को बिना किसी पारदर्शी प्रक्रिया के वापस खोल दिया गया था। फिर इस अभियान को ‘2.0’ कहकर नया रूप देने की कोशिश क्यों?
मिठाई से मीठी लगती है मिलावट, क्योंकि वह दिखती नहीं, खाने के बाद पता चलती है — और तब तक बहुत देर हो चुकी होती है। 102 किलो श्री बर्फी-मिक्स और 15 किलो बर्फी नष्ट करने का मतलब है कि इतनी मात्रा में खाद्य सामग्री किसी कारखाने या बड़ी आपूर्ति श्रृंखला से आई होगी। लेकिन विभाग ने उस सोर्स तक जांच क्यों नहीं पहुंचाई? क्या सिर्फ रिटेल दुकानदार को सजा देकर विभाग अपनी जिम्मेदारी से मुक्त हो जाता है? असली मिलावटखोर तो उस थोक विक्रेता में है जो बिना किसी डर के पूरे शहर में नकली बर्फी-मिक्स भेज रहा था। उसकी गिरफ्तारी क्यों नहीं हुई?

मेसर्स श्रीराम स्वीट्स और प्रबल फूड प्रोडक्ट का लाइसेंस निलंबित हुआ, लेकिन यह निलंबन कितने दिनों का है? किन शर्तों पर फिर से खोला जाएगा? क्या दोबारा चालू करने से पहले उनके उत्पादों की पूरी जांच होगी? क्या इस अवधि में उनके मालिकों के खिलाफ कोई आपराधिक मामला दर्ज किया गया? खाद्य सुरक्षा अधिनियम में सजा के प्रावधान हैं, पर क्या उनका उपयोग हुआ? ये जवाब विभाग को आज देना होगा, क्योंकि जनता की सेहत कोई मजाक नहीं है।
और सबसे विडंबनापूर्ण बात — इस अभियान में जन-जागरूकता पर भी जोर दिया गया। लोगों को सलाह दी गई कि लेबल पढ़ें, रंग-बिरंगी चीजों से बचें। लेकिन क्या यह जिम्मेदारी सिर्फ उपभोक्ता की है? क्या विभाग यह तय नहीं कर सकता कि बाजार में बेचे जाने वाले हर उत्पाद की लैब जांच अनिवार्य हो? क्या हर दुकान पर सीसीटीवी और ऑनलाइन निगरानी व्यवस्था नहीं की जा सकती? आज ड्रोन, मोबाइल लैब, और रियल-टाइम रिपोर्टिंग के साधन मौजूद हैं, लेकिन इनका उपयोग क्यों नहीं हो रहा?
सबसे कड़वा सत्य यह है कि अभियान में जिन दुकानों पर कार्रवाई हुई, वे सभी स्थानीय और मझोले प्रतिष्ठान हैं। क्या कभी किसी बड़े ब्रांड, फ्रेंचाइजी या ऑनलाइन फूड प्लेटफॉर्म पर भी ऐसी कार्रवाई देखने को मिली है? क्या ‘बड़े’ होने के कारण उन्हें छूट मिलती है? अगर ऐसा है तो यह अभियान सिर्फ दिखावा है — एक ढोल-नगाड़ा जो सात दिन बजा और फिर बंद हो गया।

विभाग ने कहा है कि त्योहारी सीजन को देखते हुए निगरानी जारी रहेगी। लेकिन बीते सालों का अनुभव बताता है कि दिवाली, छठ, ईद या नए साल पर मिलावट चरम पर होती है और जांच उतनी ही नीचे। अगर विभाग सचमुच गंभीर है तो उसे त्योहारों के दौरान हर जिले में फ्लाइंग स्क्वाड बनानी चाहिए, हर दुकान से अन्नियमित नमूने लेने चाहिए, और हर नमूने की रिपोर्ट 48 घंटे के भीतर ऑनलाइन जारी करनी चाहिए। साथ ही, जिन प्रतिष्ठानों की रिपोर्ट खराब आती है, उन्हें तत्काल बंद करना चाहिए और मालिक पर एफआईआर दर्ज करनी चाहिए। तभी यह अभियान ‘जन-हितैषी’ कहलाने का हकदार होगा, अन्यथा यह सिर्फ एक ‘प्रेस रिलीज’ बनकर रह जाएगा।
आखिरी सवाल — क्या यह अभियान ‘बने खाबो’ (अच्छा खाओ) के साथ-साथ ‘बने रहिबो’ (अच्छे रहो) की गारंटी देता है? जवाब तभी ‘हां’ होगा, जब विभाग हर जब्ती, हर निलंबन और हर रिपोर्ट को सार्वजनिक करेगा, जब वह छोटे-बड़े में भेदभाव नहीं करेगा, और जब वह मिलावट को अपराध मानकर उस पर सख्त से सख्त कानूनी कार्रवाई करेगा। जनता अब सिर्फ ‘प्रवर्तन अभियान’ के आंकड़ों से संतुष्ट नहीं होगी — वह असली नतीजे चाहती है: मिलावटी खाने से कोई बीमार न पड़े, कोई परिवार अस्पताल की चपेट में न आए। और यह तभी संभव है जब यह अभियान साल के 365 दिन, 24×7 जारी रहे — सिर्फ एक हफ्ते के लिए नहीं।
जब तक ऐसा नहीं होता, ‘बने खाबो 2.0’ महज एक मुहिम है, आंदोलन नहीं। और जनता को आंदोलन चाहिए — अपनी सेहत के लिए, अपने अधिकार के लिए।


