बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने वैवाहिक विवाद से जुड़े एक अहम मामले में स्पष्ट किया है कि पति के खिलाफ लगाया गया झूठा आपराधिक आरोप, यदि पति उस मामले में अंततः बरी हो जाता है और आरोपों के चलते उसे गंभीर मानसिक पीड़ा होती है, तो परिस्थितियों के आधार पर इसे मानसिक क्रूरता माना जा सकता है। हाईकोर्ट ने इसी आधार पर पति की अपील स्वीकार करते हुए जिला न्यायालय के उस आदेश को निरस्त कर दिया, जिसमें तलाक की याचिका खारिज कर दी गई थी। कोर्ट ने विवाह विच्छेद की डिक्री जारी करते हुए 12 दिसंबर 2014 को हुआ विवाह समाप्त करने का आदेश दिया।
मामले के अनुसार पति-पत्नी का विवाह 12 दिसंबर 2014 को इटावा, उत्तर प्रदेश में हिंदू रीति-रिवाज से हुआ था। 18 दिसंबर 2015 को उनके पुत्र का जन्म हुआ। पति ने आरोप लगाया कि शादी के बाद से ही पत्नी का उसके और परिवार के सदस्यों के साथ अक्सर विवाद होता था। वह कथित तौर पर गाली-गलौज और मारपीट करती थी तथा पति की वृद्ध मां से अलग रहने के लिए लगातार दबाव बनाती थी।
विवाद उस समय और गहरा गया, जब पति ने पत्नी के मोबाइल फोन में किसी अन्य व्यक्ति के साथ कथित आपत्तिजनक बातचीत और चैट देखने का आरोप लगाया। पति के अनुसार 17 जून 2018 को पत्नी ने उसकी मां के साथ भी मारपीट की। इसके बाद 26 जून 2018 को उसे पत्नी और किसी अन्य व्यक्ति के बीच कथित आपत्तिजनक बातचीत का पता चला। पति का कहना था कि पत्नी ने अपना व्यवहार सुधारने का भरोसा दिया, लेकिन परिस्थितियों में कोई खास बदलाव नहीं आया।
इसके बाद 11 अगस्त 2019 को पत्नी कथित तौर पर आभूषण और नकदी लेकर पेंड्रारोड चली गई और नाबालिग पुत्र को इटावा में ही छोड़ दिया। इसके बाद दोनों अलग-अलग रहने लगे और वैवाहिक संबंधों में दरार और गहरी होती चली गई।
दूसरी ओर पत्नी ने पति के आरोपों को खारिज किया। उसका कहना था कि पति उसके चरित्र पर संदेह करता था और उसे मानसिक तथा शारीरिक रूप से प्रताड़ित करता था। उसने किसी अन्य व्यक्ति के साथ अनुचित संबंध या बातचीत के आरोपों से भी इनकार किया।
वैवाहिक विवाद के बीच पत्नी की शिकायत पर पति के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 498-A/34 के तहत आपराधिक प्रकरण दर्ज किया गया। हालांकि इस मामले में सुनवाई के बाद न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी, पेंड्रारोड ने 17 मार्च 2026 को पति को बरी कर दिया।
इसी तथ्य को हाईकोर्ट ने मामले के समग्र घटनाक्रम में महत्वपूर्ण माना। कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के स्थापित सिद्धांतों का उल्लेख करते हुए कहा कि यदि पति के खिलाफ लगाए गए आपराधिक आरोप झूठे साबित होते हैं और उनके कारण पति को गंभीर मानसिक पीड़ा से गुजरना पड़ता है, तो ऐसी परिस्थितियां मानसिक क्रूरता की श्रेणी में आ सकती हैं।
हाईकोर्ट ने हालांकि यह भी साफ किया कि पति या पत्नी का अलग घर में रहने की इच्छा जताना अपने आप में क्रूरता नहीं माना जा सकता। यानी केवल संयुक्त परिवार से अलग रहने की मांग तलाक का आधार नहीं बनती।
लेकिन इस मामले में अदालत ने केवल अलग रहने की मांग को आधार नहीं बनाया। कोर्ट ने पत्नी के लगातार अलग रहने के दबाव, वैवाहिक विवाद, पति के खिलाफ दर्ज आपराधिक प्रकरण, उसमें पति के बरी होने और मामले से जुड़ी अन्य परिस्थितियों को एक साथ देखा। इन तमाम तथ्यों के आधार पर हाईकोर्ट इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि पत्नी का व्यवहार पति के लिए गंभीर मानसिक परेशानी का कारण बना और ऐसे हालात में वैवाहिक जीवन को जारी रखना उसके लिए कठिन हो गया था।
जिला न्यायालय ने 18 फरवरी 2025 को पति द्वारा क्रूरता साबित नहीं किए जाने के आधार पर तलाक की याचिका खारिज कर दी थी। पति ने इसी आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी। सुनवाई के दौरान रिकॉर्ड पर मौजूद साक्ष्यों और पूरे घटनाक्रम का परीक्षण करने के बाद हाईकोर्ट ने निचली अदालत के निष्कर्ष को निरस्त कर दिया।
जस्टिस नरेश कुमार चंद्रवंशी ने पति की अपील स्वीकार करते हुए जिला जज का आदेश रद्द कर दिया और हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 13 के तहत 12 दिसंबर 2014 को हुआ विवाह तलाक की डिक्री के जरिए समाप्त करने का आदेश दिया।
यह फैसला इस लिहाज से महत्वपूर्ण है कि अदालत ने महज आरोप या वैवाहिक मतभेद को तलाक का आधार नहीं माना, बल्कि पूरे घटनाक्रम और आपराधिक मामले के परिणाम को देखते हुए यह परखा कि क्या पति को ऐसी मानसिक पीड़ा हुई, जिसने वैवाहिक जीवन को असहनीय बना दिया। मामले में पति के खिलाफ दर्ज आपराधिक प्रकरण में बरी होने के तथ्य ने भी मानसिक क्रूरता के सवाल पर महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।


