Monday, March 9, 2026
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तबला वादक जाकिर हुसैन का अमेरिका के सैन फ्रांसिस्को में निधन: संगीत की दुनिया को महान कलाकार की अंतिम विदाई…

दुनिया भर में भारतीय शास्त्रीय संगीत को नई ऊंचाइयों पर ले जाने वाले तबला वादक जाकिर हुसैन का 73 वर्ष की उम्र में अमेरिका के सैन फ्रांसिस्को में निधन हो गया। उनके परिवार ने सोमवार को पुष्टि की कि हुसैन इडियोपैथिक पल्मोनरी फाइब्रोसिस के कारण उत्पन्न जटिलताओं से जूझ रहे थे। पिछले दो हफ्तों से अस्पताल में भर्ती हुसैन की हालत बिगड़ने पर उन्हें आईसीयू में रखा गया था, जहां उन्होंने अपनी अंतिम सांस ली।

जाकिर हुसैन का निधन भारतीय संगीत जगत के लिए अपूरणीय क्षति है। उनके परिवार ने आधिकारिक बयान में कहा, “एक शिक्षक, मार्गदर्शक और कलाकार के रूप में हुसैन ने अनगिनत संगीतकारों को प्रेरित किया। उनके योगदान को संगीत प्रेमियों द्वारा सदैव याद रखा जाएगा।” जाकिर हुसैन की बहन खुर्शीद ने पहले खबरों का खंडन करते हुए कहा था कि उनकी स्थिति गंभीर है, लेकिन वे जीवित हैं। हालाँकि, बीती रात उनकी हालत और अधिक बिगड़ने के बाद यह दुखद समाचार सामने आया।

संगीत की अजेय धरोहर

जाकिर हुसैन का योगदान न केवल भारतीय शास्त्रीय संगीत तक सीमित था, बल्कि उन्होंने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी भारतीय संगीत को नई पहचान दिलाई। वे चार बार ग्रैमी पुरस्कार से सम्मानित हो चुके थे, जिनमें से तीन पुरस्कार इस वर्ष की शुरुआत में 66वें ग्रैमी पुरस्कार में मिले थे। उनके करियर में छह दशक से अधिक समय तक संगीत की सेवा रही, जिसमें उन्होंने कई प्रसिद्ध भारतीय और अंतरराष्ट्रीय कलाकारों के साथ काम किया।

1973 में, जाकिर हुसैन ने अंग्रेजी गिटारवादक जॉन मैकलॉघलिन, वायलिन वादक एल शंकर और तालवादक टी.एच. ‘विक्कू’ विनायकराम के साथ मिलकर भारतीय शास्त्रीय संगीत और जैज़ का फ्यूजन प्रस्तुत किया। यह प्रोजेक्ट श्रोता जगत के लिए अद्वितीय और अनूठा था और इसने दुनिया भर में ख्याति प्राप्त की।

जीवन और प्रारंभिक यात्रा

9 मार्च 1951 को मुंबई के माहिम में जन्मे जाकिर हुसैन, तबला वादक उस्ताद अल्लारखा के पुत्र थे। संगीत उनके खून में था, और उन्होंने बहुत कम उम्र में ही तबला बजाना शुरू कर दिया था। 3 साल की उम्र में उन्होंने अपने पिता से मृदंग भी सीखा और मात्र 12 वर्ष की आयु में संगीत समारोहों में प्रस्तुतियाँ देने लगे। उनके संगीत की प्रतिभा को सभी ने पहचान लिया था, और उन्होंने जल्द ही रविशंकर, अली अकबर खान और शिवकुमार शर्मा जैसे महान संगीतकारों के साथ काम करना शुरू कर दिया।

उनकी अद्वितीय शैली और गहन ज्ञान ने उन्हें भारतीय संगीत के सबसे बड़े चेहरों में से एक बना दिया। 1988 में उन्हें पद्म श्री, 2002 में पद्म भूषण और 2023 में पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया।

संगीत के सांस्कृतिक राजदूत

जाकिर हुसैन न केवल एक कलाकार थे, बल्कि वे भारतीय संगीत के सांस्कृतिक राजदूत के रूप में भी जाने जाते थे। उनके द्वारा प्रस्तुत किए गए फ्यूजन ने न केवल भारतीय संगीत को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लोकप्रिय किया, बल्कि विश्व संगीत को भी समृद्ध किया। उनके संगीत का जादू ऐसा था कि वह दुनिया के किसी भी कोने में अपने तबले के जरिए दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर देते थे।

उनका जीवन संगीत प्रेमियों के लिए प्रेरणा का स्रोत रहेगा। उनके द्वारा सिखाई गई तकनीक और शैली का प्रभाव अगली पीढ़ियों पर भी रहेगा। उनकी मृत्यु से भारतीय संगीत ने एक महानायक खो दिया, लेकिन उनका संगीत अमर रहेगा, जो उनकी महान धरोहर का प्रमाण है।

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