Saturday, April 25, 2026
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कहीं हाईकोर्ट के निर्देश पर ताबड़तोड़ कार्रवाई, तो कहीं बिना मान्यता–बिना एनओसी ‘बिरला ओपन इंटरनेशनल’ स्कूलों का निर्बाध कारोबार…

बिलासपुर में इन दिनों शिक्षा व्यवस्था को लेकर जो तस्वीर उभर रही है, वह सिर्फ अनियमितताओं की कहानी नहीं, बल्कि सिस्टम की चयनात्मक सख्ती का आईना बन चुकी है। एक ही शहर, एक ही दायरे में दो अलग-अलग रवैये—कहीं हाईकोर्ट के निर्देशों के बाद तत्काल कार्रवाई, तो कहीं वर्षों से चल रहा संचालन बिना किसी ठोस हस्तक्षेप के। सवाल सीधा है—जब नियम लागू करने की क्षमता है, तो इच्छाशक्ति कहां गायब हो जाती है?

ब्रिलिएंट और सेंट जेवियर जैसे संस्थानों पर जिस तेजी से कार्रवाई होती है, वही प्रशासनिक सक्रियता बिरला फाउंडेशन/ओपन स्कूल नेटवर्क के मामले में नजर क्यों नहीं आती? यह विरोधाभास अब महज स्थानीय चर्चा नहीं रहा, बल्कि यह प्रशासनिक निष्पक्षता पर सीधा सवाल बन चुका है। और जब इस पूरे मामले को एक बड़े कोयला कारोबारी से जोड़कर देखा जाता है, तो संदेह और गहरा हो जाता है—क्या प्रभाव और पहुंच नियमों से ऊपर हैं?

मोपका स्थित बिरला फाउंडेशन इंटरनेशनल स्कूल को कक्षा 1 से 8 तक की मान्यता होने की बात कही जाती है, लेकिन जमीन पर तस्वीर इससे अलग दिखती है। 12वीं तक कक्षाएं संचालित होने के आरोप हैं, जबकि सीबीएसई संबद्धता और अनिवार्य एनओसी जैसे दस्तावेज सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं। यह सिर्फ तकनीकी खामी नहीं, बल्कि शिक्षा के नाम पर विश्वास के साथ खिलवाड़ है।

और मामला यहीं नहीं रुकता। दीनदयाल उपाध्याय गार्डन के सामने एक अन्य परिसर में कक्षा 1 से 4 तक की पढ़ाई—बिना स्पष्ट मान्यता के। छात्रों की पढ़ाई एक जगह, प्रमाण पत्र दूसरी जगह से—यह मॉडल न सिर्फ नियमों को दरकिनार करता है, बल्कि भविष्य में छात्रों के करियर पर भी सवाल खड़े करता है।

व्यापार विहार में स्थिति और दिलचस्प है। यहां स्कूल द्वारा सार्वजनिक गार्डन को अपना खेल मैदान बताया जाता है, लेकिन अनुमति के दस्तावेज नहीं। बावजूद इसके खेल शुल्क वसूला जा रहा है। यानी सुविधाएं कागजों में, और शुल्क हकीकत में—यह सीधा-सीधा अभिभावकों के साथ आर्थिक अन्याय है।

फीस का मामला भी कम गंभीर नहीं। शासन ने जहां 8% की सीमा तय की, वहीं 10 से 14% तक वृद्धि के आरोप सामने हैं। फीस नियमन समिति की अनदेखी, हर साल नए शुल्क—यह पैटर्न नियमों के समानांतर एक अलग व्यवस्था के चलने का संकेत देता है।

सबसे चिंताजनक पहलू है पाठ्यक्रम। राज्य शासन की पुस्तकों को दरकिनार कर निजी प्रकाशनों को अनिवार्य करना न सिर्फ आर्थिक बोझ बढ़ाता है, बल्कि शिक्षा के संतुलन को भी बिगाड़ता है। छोटे बच्चों के कंधों पर भारी बैग सिर्फ किताबों का वजन नहीं, बल्कि सिस्टम की लापरवाही का बोझ है।

यह पूरा ढांचा अब एक स्कूल या एक ट्रस्ट तक सीमित मुद्दा नहीं रह गया है। यह उस निगरानी तंत्र की परीक्षा है, जो नियम तो बनाता है, लेकिन उनके पालन में असमानता क्यों दिखती है? जब एक ही शहर में अलग-अलग मानदंड लागू होते दिखें, तो यह सिर्फ प्रशासनिक चूक नहीं, बल्कि संस्थागत विश्वसनीयता पर चोट है।

जिला शिक्षा विभाग की चुप्पी इस पूरे मामले को और गंभीर बना देती है। सवाल उठते हैं, शिकायतें सामने आती हैं, लेकिन कार्रवाई का अभाव एक संदेश देता है—या तो सिस्टम देख नहीं पा रहा, या फिर देख कर भी अनदेखा कर रहा है।

बिलासपुर में मोपका से व्यापार विहार तक फैला यह नेटवर्क अब एक केस स्टडी बन चुका है—कैसे नियमों की मौजूदगी के बावजूद उनका अनुपालन सुनिश्चित नहीं हो पाता। अगर यह स्थिति यूं ही जारी रही, तो इसका असर सिर्फ कुछ संस्थानों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरी शिक्षा व्यवस्था की साख पर पड़ेगा।

आखिरकार, सवाल यही है—क्या कानून सबके लिए बराबर है, या फिर कुछ नाम और प्रभाव उसे मोड़ने की ताकत रखते हैं? जब तक इस सवाल का स्पष्ट जवाब कार्रवाई के रूप में सामने नहीं आता, तब तक बिलासपुर की शिक्षा व्यवस्था पर उठते ये सवाल थमने वाले नहीं हैं।

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