बिलासपुर। छत्तीसगढ़ में निजी स्कूलों द्वारा मनमानी फीस वसूली पर अब सरकार ने सख्त रुख अपना लिया है। लोक शिक्षण संचालनालय ने प्रदेश के सभी मान्यता प्राप्त निजी विद्यालयों को फीस विनियमन अधिनियम का कड़ाई से पालन करने के निर्देश जारी किए हैं। इसके साथ ही स्कूलों की जवाबदेही तय करते हुए कई अहम जानकारियां भी तलब की गई हैं।
दरअसल, पिछले कुछ समय से अभिभावकों की ओर से लगातार शिकायतें मिल रही थीं कि कई निजी स्कूल तय नियमों का पालन नहीं कर रहे हैं और मनमाने तरीके से फीस बढ़ा रहे हैं। इससे अभिभावकों पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ रहा था। इसी को ध्यान में रखते हुए सरकार ने अब सख्ती बढ़ा दी है।
संचालनालय ने सभी जिला शिक्षा अधिकारियों और संभागीय संयुक्त संचालकों को निर्देशित किया है कि वे अपने-अपने क्षेत्रों के निजी स्कूलों में ‘फीस विनियमन समिति’ के गठन की स्थिति की जांच करें। जिन स्कूलों में अब तक यह समिति नहीं बनी है, उनके खिलाफ की गई कार्रवाई की जानकारी भी मांगी गई है। साथ ही यह भी सुनिश्चित करने को कहा गया है कि स्कूलों में हर साल फीस निर्धारण के लिए बैठकें हो रही हैं या नहीं और तय शुल्क की जानकारी नोटिस बोर्ड पर सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित की जा रही है या नहीं।
सरकार ने सख्ती दिखाते हुए पिछले तीन शैक्षणिक सत्र—2024-25, 2025-26 और 2026-27—के दौरान जिला स्तरीय शुल्क समितियों की बैठकों का पूरा ब्यौरा भी मांगा है। इससे यह स्पष्ट हो गया है कि अब केवल वर्तमान व्यवस्था ही नहीं, बल्कि पिछले वर्षों के कामकाज की भी समीक्षा की जाएगी।
छत्तीसगढ़ अशासकीय विद्यालय फीस विनियमन अधिनियम, 2020 के तहत निजी स्कूल किसी भी शैक्षणिक वर्ष में 8 प्रतिशत से अधिक फीस वृद्धि बिना अनुमति नहीं कर सकते। यदि कोई स्कूल इससे अधिक बढ़ोतरी करना चाहता है, तो उसे ठोस कारणों के साथ जिला फीस समिति से अनुमति लेना अनिवार्य होगा। बिना अनुमति बढ़ाई गई फीस को अवैध माना जाएगा।
अधिनियम के तहत फीस निर्धारण प्रक्रिया को पारदर्शी बनाने के लिए अभिभावकों की भागीदारी भी सुनिश्चित की गई है। स्कूल स्तर पर बनने वाली फीस समिति में अभिभावक प्रतिनिधियों को शामिल करना जरूरी है, ताकि एकतरफा निर्णयों पर रोक लग सके। साथ ही स्कूलों को अपनी वेबसाइट और नोटिस बोर्ड पर फीस का पूरा विवरण प्रदर्शित करना अनिवार्य किया गया है।
नियमों के अनुसार स्कूल केवल निर्धारित मदों में ही शुल्क ले सकते हैं, जिनमें ट्यूशन फीस, प्रवेश शुल्क (एक बार), सावधि निधि, पुस्तकालय और प्रयोगशाला शुल्क तथा डिजिटल लर्निंग शुल्क शामिल हैं। वहीं परिवहन, भोजन और अन्य अतिरिक्त गतिविधियों के लिए शुल्क केवल उन्हीं छात्रों से लिया जा सकता है, जो इन सुविधाओं का लाभ लेते हैं।
अधिनियम के तहत किसी भी प्रकार की कैपिटेशन फीस या डोनेशन लेना पूरी तरह प्रतिबंधित है। इसके उल्लंघन पर सख्त कार्रवाई का प्रावधान है। पहली बार नियम तोड़ने पर 1 लाख से 5 लाख रुपये तक और दोबारा उल्लंघन करने पर 2 लाख से 10 लाख रुपये तक का जुर्माना लगाया जा सकता है। लगातार अनियमितता पाए जाने पर स्कूल की मान्यता रद्द करने की सिफारिश भी की जा सकती है।
सरकार के इस कड़े कदम से अभिभावकों को बड़ी राहत मिलने की उम्मीद है। अब देखना होगा कि इन निर्देशों का जमीनी स्तर पर कितना असर पड़ता है और क्या वास्तव में निजी स्कूलों की मनमानी पर लगाम लग पाती है।


