रायपुर, 24 अप्रैल 2026। छत्तीसगढ़ में निजी स्कूलों द्वारा मनमाने ढंग से फीस वसूली के बढ़ते मामलों ने आखिरकार राज्य सरकार को सख्त कदम उठाने पर मजबूर कर दिया है। अब शासन ने साफ संकेत दे दिए हैं कि शिक्षा के नाम पर आर्थिक शोषण बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। चीफ सेक्रेटरी द्वारा सभी जिला कलेक्टरों को जारी कड़े निर्देशों के बाद प्रदेशभर के निजी स्कूलों में हलचल तेज हो गई है।
दरअसल, हाल के दिनों में मीडिया रिपोर्ट्स और अभिभावकों की शिकायतों के जरिए यह सामने आया था कि कई निजी स्कूल निर्धारित नियमों को दरकिनार कर फीस में मनमानी बढ़ोतरी कर रहे हैं। इससे न केवल कानून का उल्लंघन हो रहा था, बल्कि मध्यमवर्गीय और निम्न आय वर्ग के अभिभावकों पर अतिरिक्त आर्थिक दबाव भी बढ़ रहा था। इस गंभीर स्थिति को देखते हुए सरकार ने तत्काल प्रभाव से निगरानी तंत्र को मजबूत करने का निर्णय लिया है।
राज्य में पहले से लागू छत्तीसगढ़ अशासकीय विद्यालय फीस विनियमन विधेयक 2020 को अब पूरी सख्ती के साथ लागू कराने पर जोर दिया जा रहा है। इस कानून के तहत हर निजी स्कूल में एक विद्यालय फीस समिति का गठन अनिवार्य है, जो फीस वृद्धि को नियंत्रित करती है। नियम स्पष्ट हैं—स्कूल हर वर्ष अधिकतम 8 प्रतिशत तक ही फीस बढ़ा सकते हैं। इससे अधिक वृद्धि के लिए उन्हें जिला स्तरीय फीस विनियमन समिति से पूर्व अनुमति लेना जरूरी होगा।
सरकार ने यह भी सुनिश्चित करने के निर्देश दिए हैं कि इन समितियों की भूमिका सिर्फ कागजों तक सीमित न रहे, बल्कि वे सक्रिय रूप से काम करें। इसके साथ ही नोडल प्राचार्य की भूमिका को भी महत्वपूर्ण माना गया है, जो पूरे सिस्टम में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए जिम्मेदार होंगे।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इन निर्देशों का सही तरीके से पालन हुआ, तो यह शिक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता लाने की दिशा में एक बड़ा कदम साबित हो सकता है। वहीं अभिभावकों के लिए यह राहत की खबर है, जो लंबे समय से फीस वृद्धि के मुद्दे पर परेशान थे।
हालांकि, असली चुनौती इन निर्देशों के जमीनी क्रियान्वयन की होगी। अक्सर देखा गया है कि नियम तो बन जाते हैं, लेकिन उनका पालन सुनिश्चित कराना प्रशासन के लिए कठिन साबित होता है। ऐसे में अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि जिला प्रशासन कितनी गंभीरता से इन आदेशों को लागू करता है और क्या वास्तव में अभिभावकों को राहत मिल पाती है।
स्पष्ट है कि सरकार का यह कदम केवल एक प्रशासनिक आदेश नहीं, बल्कि शिक्षा व्यवस्था में संतुलन और जवाबदेही स्थापित करने की एक ठोस पहल है। अगर यह सख्ती निरंतर बनी रहती है, तो आने वाले समय में निजी स्कूलों की मनमानी पर लगाम लगना तय माना जा रहा है।



