बिलासपुर। पचपेड़ी में प्रस्तावित शासकीय महाविद्यालय भवन अब केवल एक निर्माण परियोजना नहीं रह गया है, बल्कि यह प्रशासनिक पारदर्शिता, ग्राम पंचायत के अधिकार और ग्रामीणों की जनभावनाओं की परीक्षा बनता जा रहा है। तीन वर्षों से जिस प्रक्रिया को आगे बढ़ाया गया, जिस जमीन पर पंचायत ने सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित किया, जिस पर राजस्व विभाग ने सार्वजनिक सूचना जारी की और जिस पर किसी ने आपत्ति तक दर्ज नहीं कराई, अब उसी प्रक्रिया के अंतिम चरण में स्थान परिवर्तन की चर्चा ने बड़ा विवाद खड़ा कर दिया है।
मस्तूरी विकासखंड की ग्राम पंचायत पचपेड़ी ने जिला कलेक्टर को लिखे पत्र में गंभीर आरोप लगाया है कि एसडीएम स्तर पर पहले से प्रस्तावित भूमि को बदलने की कोशिश की जा रही है। पंचायत का कहना है कि यह न केवल ग्रामसभा के सर्वसम्मत निर्णय की अनदेखी है, बल्कि तीन साल से चली आ रही पूरी प्रशासनिक प्रक्रिया पर भी सवाल खड़े करता है।
पंचायत के अनुसार 26 अप्रैल 2025 को खसरा नंबर 729 और 1004 की लगभग 10 एकड़ भूमि महाविद्यालय भवन निर्माण के लिए प्रस्तावित की गई थी। प्रस्ताव संबंधित महाविद्यालय प्राचार्य को भेजा गया, तहसीलदार ने सार्वजनिक सूचना जारी की और निर्धारित समय तक किसी भी व्यक्ति ने कोई आपत्ति दर्ज नहीं कराई। ऐसे में यदि अब अचानक दूसरी जगह भवन निर्माण की प्रक्रिया शुरू होती है तो सबसे बड़ा सवाल यही उठता है कि आखिर ऐसी कौन-सी नई परिस्थितियां उत्पन्न हो गईं, जिनके कारण पहले से स्वीकृत प्रक्रिया को बदला जा रहा है?
ग्रामीणों की नाराजगी का कारण भी यही है। उनका कहना है कि यदि प्रशासन ने पूरी कानूनी प्रक्रिया पूरी कर ली थी और किसी प्रकार का विवाद नहीं था, तो फिर अंतिम समय में स्थान बदलने की जरूरत क्यों महसूस हुई? क्या इसके पीछे कोई प्रशासनिक मजबूरी है, या फिर किसी अन्य दबाव में निर्णय बदला जा रहा है? इन सवालों का जवाब फिलहाल किसी के पास नहीं है।
पचपेड़ी और आसपास के ग्रामीणों के लिए यह महाविद्यालय केवल एक भवन नहीं, बल्कि शिक्षा और भविष्य की उम्मीद है। वर्षों से हाईस्कूल भवन में संचालित हो रहे कॉलेज के स्थायी भवन का इंतजार कर रहे विद्यार्थियों और अभिभावकों को उम्मीद थी कि अब जल्द ही उनका अपना परिसर तैयार होगा। लेकिन अब निर्माण स्थल को लेकर पैदा हुए विवाद ने उस उम्मीद पर अनिश्चितता का साया डाल दिया है।
ग्राम पंचायत ने अपने पत्र में साफ चेतावनी दी है कि यदि स्वीकृत स्थान पर भवन निर्माण नहीं हुआ तो पूरे क्षेत्र में व्यापक जनआक्रोश पैदा होगा और धरना-प्रदर्शन की स्थिति बनेगी, जिसकी जिम्मेदारी शासन और प्रशासन की होगी। यह चेतावनी बताती है कि मामला अब केवल फाइलों तक सीमित नहीं है, बल्कि गांव की जनता इसे अपने अधिकार और सम्मान के मुद्दे के रूप में देख रही है।
अब सबसे बड़ा दायित्व जिला प्रशासन पर है। यदि वास्तव में स्थान परिवर्तन की कोई ठोस तकनीकी, कानूनी या सार्वजनिक आवश्यकता है तो उसे पूरी पारदर्शिता के साथ सामने लाना होगा। लेकिन यदि बिना पर्याप्त कारण के तीन साल पुरानी प्रक्रिया को बदला जाता है, तो इससे प्रशासन की कार्यप्रणाली और निर्णय प्रक्रिया पर गंभीर सवाल उठना स्वाभाविक होगा।
पचपेड़ी कॉलेज भवन विवाद अब प्रशासन के लिए एक बड़ी परीक्षा बन चुका है। एक ओर ग्रामसभा का सर्वसम्मत प्रस्ताव है, दूसरी ओर प्रशासनिक स्तर पर कथित नई कवायद। ऐसे में कलेक्टर का फैसला केवल भवन की जमीन तय नहीं करेगा, बल्कि यह भी तय करेगा कि ग्रामीणों के लोकतांत्रिक निर्णयों का सम्मान होगा या फिर विकास योजनाओं में अंतिम समय पर फैसले बदलने की परंपरा और मजबूत होगी। अब पूरा क्षेत्र इसी फैसले का इंतजार कर रहा है।


