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रीडर ही क्यों? सर्पदंश मुआवजा फर्जीवाड़े में तीन गिरफ्तारियों के बाद भड़का राजस्व लिपिक संघ, प्रदेशव्यापी आंदोलन की चेतावनी…

बिलासपुर। सर्पदंश और प्राकृतिक आपदा सहायता राशि से जुड़े कथित फर्जीवाड़े की जांच अब सिर्फ पुलिस कार्रवाई तक सीमित नहीं रही, बल्कि प्रशासनिक और न्यायालयीन व्यवस्था की जवाबदेही पर भी बड़ा सवाल खड़ा कर रही है। तीन राजस्व लिपिकों की गिरफ्तारी के बाद छत्तीसगढ़ प्रदेश राजस्व लिपिक संघ खुलकर सरकार और पुलिस के खिलाफ मोर्चे पर उतर आया है। संघ ने संभागायुक्त, आईजी और कलेक्टर को ज्ञापन सौंपते हुए पुलिस की कार्रवाई को “एकतरफा, चयनात्मक और कानून के स्थापित सिद्धांतों के विपरीत” करार दिया है। साथ ही साफ चेतावनी दी है कि यदि कार्रवाई पर पुनर्विचार नहीं हुआ तो प्रदेशभर के राजस्व लिपिक सामूहिक अवकाश पर चले जाएंगे।

संघ का सबसे बड़ा सवाल यही है कि यदि कथित फर्जीवाड़ा राजस्व न्यायालयों में पारित आदेशों के माध्यम से हुआ है तो फिर केवल रीडरों को ही आरोपी क्यों बनाया जा रहा है? ज्ञापन में कहा गया है कि थाना सरकंडा में दर्ज अपराधों के तहत तीन लिपिकों को बिना पूर्व नोटिस गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया, जबकि बाद में आठ अन्य लिपिकों को नोटिस देकर बयान के लिए बुलाया गया और उन्होंने जांच में पूरा सहयोग भी किया। ऐसे में केवल कुछ कर्मचारियों की गिरफ्तारी को संघ ने “चयनात्मक कार्रवाई” बताया है।

राजस्व लिपिक संघ ने स्पष्ट किया है कि न्यायालय में पदस्थ रीडर या वाचक का दायित्व केवल दस्तावेज प्रस्तुत करना, अभिलेखों का संधारण करना और पीठासीन अधिकारी के आदेशानुसार रिकॉर्ड का संचालन करना होता है। किसी आवेदन, शपथपत्र, प्रमाणपत्र या दस्तावेज की सत्यता का परीक्षण करना अथवा आदेश पारित करना उनके अधिकार क्षेत्र में नहीं आता। अंतिम निर्णय संबंधित तहसीलदार या न्यायालय के पीठासीन अधिकारी द्वारा लिया जाता है।

संघ का कहना है कि यदि जांच में फर्जी हस्ताक्षर, नकली सील, कूटरचित दस्तावेज या झूठे शपथपत्र सामने आए हैं तो पूरी प्रक्रिया की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। यह पता लगाया जाना चाहिए कि फर्जी दस्तावेज किसने तैयार किए, किस स्तर पर उनका सत्यापन हुआ और किन अधिकारियों के आदेश से लाभ स्वीकृत हुआ। केवल रिकॉर्ड प्रस्तुत करने वाले कर्मचारियों को जेल भेज देना न्यायसंगत नहीं कहा जा सकता।

ज्ञापन में पुलिस से यह मांग भी की गई है कि यदि न्यायालय को मिथ्या तथ्यों और कूटरचित दस्तावेजों के आधार पर गुमराह कर आदेश प्राप्त किए गए हैं तो भारतीय न्याय संहिता (BNS) के तहत ‘Fraud Upon the Court’ के पहलू की भी गंभीर जांच की जाए और वास्तविक षड्यंत्रकारियों एवं दोषियों तक कार्रवाई पहुंचाई जाए।

संघ का दावा है कि मौजूदा कार्रवाई से प्रदेशभर के राजस्व न्यायालयों में कार्यरत रीडरों और लिपिकों के बीच भय का माहौल बन गया है। कर्मचारियों का कहना है कि यदि भविष्य में केवल दस्तावेज प्रस्तुत करने वाले कर्मचारियों पर ही आपराधिक कार्रवाई का खतरा बना रहेगा तो न्यायालयीन कामकाज प्रभावित होना तय है। यही कारण है कि संघ ने इसे केवल तीन कर्मचारियों का मामला नहीं, बल्कि पूरे राजस्व तंत्र की कार्यप्रणाली से जुड़ा मुद्दा बताया है।

हालांकि दूसरी ओर यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि पुलिस का दावा है कि वह सरकारी सहायता राशि में हुए कथित फर्जीवाड़े की तह तक पहुंचने के लिए जांच कर रही है और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर कार्रवाई की जा रही है। ऐसे में अंतिम रूप से जिम्मेदारी किसकी बनती है, इसका निर्धारण जांच और न्यायिक प्रक्रिया के बाद ही होगा।

फिलहाल इतना तय है कि यह मामला अब केवल कथित फर्जीवाड़े की जांच नहीं रह गया है। यह प्रशासनिक जवाबदेही, न्यायालयीन प्रक्रिया और कर्मचारियों की भूमिका पर भी बड़ी बहस बन चुका है। यदि सरकार, प्रशासन और कर्मचारी संगठन के बीच जल्द कोई संतुलित समाधान नहीं निकला, तो यह विवाद प्रदेशव्यापी आंदोलन का रूप ले सकता है और उसका सीधा असर राजस्व न्यायालयों के कामकाज पर भी पड़ सकता है।

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