बिलासपुर नगर निगम की मेयर-इन-काउंसिल (MIC) की एक बैठक में बोले गए एक शब्द ने पूरे प्रशासनिक तंत्र में ऐसी हलचल मचा दी है, जिसकी गूंज अब सिर्फ निगम मुख्यालय तक सीमित नहीं है। “मक्कार”… यह एक शब्द अब केवल बयान नहीं रहा, बल्कि जनप्रतिनिधियों और अधिकारियों के रिश्तों, जवाबदेही की मर्यादा और प्रशासनिक सम्मान की परीक्षा बन गया है।
सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि किसी MIC सदस्य ने निगम के अभियंताओं के लिए ऐसा शब्द क्यों इस्तेमाल किया। असली सवाल यह है कि क्या लोकतांत्रिक संस्थाओं में असहमति और असंतोष व्यक्त करने की भी कोई भाषा और मर्यादा होनी चाहिए, या फिर सार्वजनिक मंचों पर पूरे संवर्ग को कठघरे में खड़ा कर देना स्वीकार्य माना जाएगा?
नगर निगम के अभियंताओं ने जिस तरह सामूहिक रूप से सामने आकर लिखित आपत्ति दर्ज कराई है, वह बताता है कि यह मामला किसी एक अधिकारी की व्यक्तिगत नाराजगी का नहीं, बल्कि पूरे इंजीनियरिंग विंग के आत्मसम्मान से जुड़ गया है। अभियंताओं ने अपने पत्र में केवल विरोध नहीं जताया, बल्कि यह भी बताया कि उनका काम सिर्फ सड़क और नाली का निरीक्षण करना नहीं है। सर्वे, प्राक्कलन, टेंडर, मापन, गुणवत्ता नियंत्रण, भवन अनुज्ञा, अतिक्रमण, जल निकासी, स्ट्रीट लाइट, बाढ़ प्रबंधन, न्यायालयीन प्रकरण, पोर्टल संचालन और आपदा राहत तक का बोझ उन्हीं के कंधों पर है। कई जगह पर्याप्त स्टाफ तक उपलब्ध नहीं है और तकनीकी अधिकारियों को लिपिकीय काम भी खुद करना पड़ता है।
यही वह पक्ष है, जिसे अक्सर राजनीतिक बहसों में नजरअंदाज कर दिया जाता है।
लेकिन कहानी का दूसरा पहलू भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
यह भी सच है कि नगर निगम के निर्माण कार्यों की गुणवत्ता, अधूरे प्रोजेक्ट, गड्ढों वाली सड़कें, जलभराव, धीमी विकास योजनाएं और नागरिकों की शिकायतें लगातार सवालों के घेरे में रही हैं। जनप्रतिनिधियों को जनता ने इसी जवाबदेही के लिए चुना है कि वे अधिकारियों से सवाल पूछें, काम की समीक्षा करें और कमियां उजागर करें। यदि कोई इंजीनियर या अधिकारी अपने दायित्वों में लापरवाही करता है तो उसके खिलाफ कार्रवाई भी होनी चाहिए।
लेकिन क्या पूरे अभियंता संवर्ग को एक ही तराजू में तौल देना न्यायसंगत है?
किसी विभाग में यदि संसाधनों की कमी है, पर्याप्त स्टाफ नहीं है, बजट सीमित है या प्रशासनिक बाधाएं हैं, तो क्या उन परिस्थितियों की अनदेखी करके केवल परिणामों के आधार पर पूरी टीम को “मक्कार” कह देना समस्या का समाधान है? शायद नहीं।
लोकतंत्र की खूबसूरती आलोचना में है, लेकिन उसकी गरिमा भाषा में है। तीखे सवाल पूछना जनप्रतिनिधि का अधिकार है, पर अपमानजनक विशेषणों का इस्तेमाल संस्थागत विश्वास को कमजोर करता है। जिस अधिकारी से अगले दिन फिर उसी जनप्रतिनिधि को काम लेना है, उसके साथ सार्वजनिक मंच पर सम्मान की सीमा टूटेगी तो प्रशासनिक समन्वय भी प्रभावित होगा।
इस पूरे विवाद ने एक और बड़ी कमी उजागर कर दी है। नगर निगम में आज तक जनप्रतिनिधियों और अधिकारियों के बीच संवाद की कोई स्पष्ट आचार-संहिता विकसित नहीं हो सकी है। बहसें अक्सर व्यक्तिगत टिप्पणियों तक पहुंच जाती हैं और फिर कामकाज से ज्यादा विवाद सुर्खियां बनने लगते हैं।
अभियंताओं ने अपने पत्र में छह मांगें रखी हैं—टिप्पणी का संज्ञान, सार्वजनिक माफी, कार्यवृत्त में आपत्ति दर्ज करना और भविष्य के लिए आचार-मानक तय करना। अब गेंद नगर निगम प्रशासन और MIC के पाले में है। यदि इस विवाद का समाधान केवल बयानबाजी से किया गया तो यह दरार और गहरी होगी। लेकिन यदि इसे संस्थागत सुधार के अवसर के रूप में लिया गया तो भविष्य के लिए बेहतर कार्यसंस्कृति विकसित हो सकती है।
आखिरकार सवाल किसी एक शब्द का नहीं है।
सवाल यह है कि क्या नगर निगम में जवाबदेही का मतलब अपमान है, या फिर जवाबदेही और सम्मान साथ-साथ चल सकते हैं?
यदि कोई अधिकारी दोषी है तो जांच हो, जिम्मेदारी तय हो और कार्रवाई भी हो। लेकिन यदि पूरी बिरादरी को एक झटके में बेईमान, निकम्मा या “मक्कार” घोषित कर दिया जाएगा, तो इससे न भ्रष्टाचार खत्म होगा, न विकास तेज होगा और न ही जनता का भरोसा मजबूत होगा।
बिलासपुर नगर निगम का यह विवाद अब एक आईना बन चुका है। इस आईने में सिर्फ अभियंता या जनप्रतिनिधि नहीं, बल्कि पूरी प्रशासनिक व्यवस्था दिखाई दे रही है। अब देखना यह है कि इस आईने को तोड़ा जाता है या इसमें दिख रही कमियों को सुधारने की कोशिश की जाती है। यही इस पूरे विवाद की असली परीक्षा होगी।


