Bilateral Choanal Atresia जैसी दुर्लभ जन्मजात बीमारी से था मासूम पीड़ित, जटिल सर्जरी और लगातार निगरानी के बाद स्वस्थ होकर लौटा घर
बिलासपुर, 8 अगस्त 2026। जन्म के साथ ही एक नन्ही जिंदगी सांसों के लिए संघर्ष करने लगी। दुनिया में कदम रखते ही जिस बच्चे को मां की गोद और परिवार का प्यार मिलना था, वह जिंदगी और मौत के बीच जूझ रहा था। दोनों नासिका मार्ग जन्म से ही बंद होने के कारण नवजात को गंभीर श्वसन संकट का सामना करना पड़ा। हालत इतनी नाजुक थी कि उसे तत्काल वेंटिलेटर सपोर्ट देना पड़ा।
लेकिन चिकित्सकों की तत्परता, जटिल सर्जरी, करीब एक महीने की सतत निगरानी और नर्सिंग टीम की लगातार मेहनत ने आखिरकार इस नन्ही जिंदगी को मौत के मुंह से बाहर निकाल लिया। श्री शिशु भवन हॉस्पिटल, बिलासपुर में Bilateral Choanal Atresia से पीड़ित नवजात का सफल उपचार कर उसे स्वस्थ अवस्था में घर भेज दिया गया।
लोरमी के वार्ड क्रमांक-2, डोंगरी पारा निवासी गौसिया परवीन के बच्चे का जन्म 3 जुलाई 2026 को हुआ था। जन्म के तुरंत बाद ही बच्चे को सांस लेने में गंभीर परेशानी होने लगी। चिकित्सकों ने जब स्थिति को देखा तो दोनों नासिका मार्ग जन्म से बंद होने की गंभीर स्थिति सामने आई। परिवार के लिए यह किसी बड़े सदमे से कम नहीं था।
परिजन नवजात को उसी दिन श्री शिशु भवन हॉस्पिटल लेकर पहुंचे। यहां डॉ. श्रीकांत गिरी के नेतृत्व में चिकित्सकीय टीम ने बिना समय गंवाए उपचार शुरू किया। सबसे पहली चुनौती बच्चे की सांस और शरीर में ऑक्सीजन का स्तर नियंत्रित करना था। गंभीर हालत को देखते हुए उसे करीब एक सप्ताह तक वेंटिलेटर सपोर्ट पर रखा गया।
बंद थीं सांसों की दोनों राहें
डॉ. श्रीकांत गिरी के अनुसार Bilateral Choanal Atresia नवजात शिशुओं में होने वाली एक दुर्लभ जन्मजात बीमारी है। इसमें नाक के दोनों पिछले वायुमार्ग जन्म से ही बंद रहते हैं।
नवजात शिशु शुरुआती अवस्था में मुख्य रूप से नाक से सांस लेते हैं। ऐसे में यदि दोनों नासिका मार्ग बंद हों तो बच्चे को सांस लेने में गंभीर परेशानी के साथ शरीर में ऑक्सीजन की कमी हो सकती है। स्थिति बिगड़ने पर शरीर नीला पड़ने और जान पर संकट जैसी स्थिति भी उत्पन्न हो सकती है।
ऐसे मामलों में उपचार की पहली चुनौती बच्चे की सांस और ऑक्सीजन की स्थिति को स्थिर करना होती है। इसके बाद चिकित्सकीय स्थिति के अनुसार बंद वायुमार्ग को खोलने के लिए सर्जिकल उपचार किया जाता है।
एक सप्ताह वेंटिलेटर, फिर जटिल सर्जरी
नवजात की हालत गंभीर होने के कारण चिकित्सकों ने पहले उसे स्थिर करने पर पूरा ध्यान दिया। करीब एक सप्ताह तक वेंटिलेटर सपोर्ट के दौरान उसकी लगातार निगरानी की गई। स्थिति नियंत्रित होने के बाद विशेषज्ञ टीम ने आवश्यक तैयारी के साथ जटिल सर्जिकल उपचार किया।
सर्जरी के बाद भी चुनौती खत्म नहीं हुई थी। नवजात को लगातार चिकित्सकीय निगरानी और विशेष नर्सिंग देखभाल की जरूरत थी। करीब 30 दिनों तक इलाज, निगरानी और विशेष देखभाल के बाद बच्चे की हालत में लगातार सुधार आया और आखिरकार वह स्वस्थ होकर अस्पताल से बाहर निकलने की स्थिति में पहुंचा।
8 अगस्त को नवजात को स्वस्थ अवस्था में अस्पताल से छुट्टी दे दी गई।
डॉक्टर से लेकर नर्सिंग स्टाफ तक, सबने मिलकर बचाई जिंदगी
इस कठिन उपचार में डॉ. श्रीकांत गिरी, डॉ. रवि द्विवेदी, डॉ. अंकित ठकराल, डॉ. प्रणव अंधारे, डॉ. विशाल मांझी और डॉ. मोनिका जायसवाल सहित पूरी चिकित्सकीय टीम की महत्वपूर्ण भूमिका रही।
अस्पताल प्रबंधक नवल वर्मा के मार्गदर्शन में नर्सिंग और सपोर्ट स्टाफ ने भी बच्चे की लगातार देखभाल की। गंभीर स्थिति से लेकर सर्जरी और उसके बाद रिकवरी तक हर चरण में टीम ने समन्वय के साथ काम किया।
जब बच्चे को गोद में लेकर घर लौटे माता-पिता
करीब एक महीने तक अस्पताल में जिंदगी की जंग लड़ने के बाद जब नवजात स्वस्थ होकर माता-पिता की गोद में पहुंचा तो परिवार के लिए वह पल भावुक कर देने वाला था। जिस बच्चे के जन्म के बाद सांसों को लेकर चिंता छा गई थी, वही बच्चा अब स्वस्थ अवस्था में अपने माता-पिता के साथ घर लौट रहा था।
माता-पिता ने इलाज करने वाले चिकित्सकों, नर्सिंग स्टाफ और पूरी टीम के प्रति आभार जताया।
यह मामला सिर्फ एक सफल सर्जरी की कहानी नहीं है, बल्कि यह बताता है कि दुर्लभ और गंभीर जन्मजात बीमारी में समय पर अस्पताल पहुंचना, विशेषज्ञ चिकित्सकीय हस्तक्षेप, आधुनिक उपचार, सतत निगरानी और पूरी टीम का समन्वय किसी नन्ही जिंदगी के लिए कितना निर्णायक साबित हो सकता है।
जन्म के साथ बंद थीं सांसों की राहें, लेकिन इलाज ने उम्मीद की राह खोल दी। करीब 30 दिन की जद्दोजहद के बाद नन्हा मासूम आखिरकार अपनी मां की गोद में स्वस्थ होकर घर लौट गया।


