बिलासपुर में आयोजित एक अहम प्रेस वार्ता के दौरान महिला संगठन ने नारी शक्ति वंदन कानून का जोरदार स्वागत करते हुए स्पष्ट कर दिया कि देश की राजनीति अब एक नए मोड़ पर खड़ी है। मंच से उठी आवाज सिर्फ समर्थन तक सीमित नहीं रही, बल्कि एक बड़े राजनीतिक लक्ष्य की घोषणा भी की गई—33 प्रतिशत आरक्षण को शुरुआत मानते हुए अब महिलाओं की 50 प्रतिशत भागीदारी सुनिश्चित करने की दिशा में संघर्ष तेज किया जाएगा।
प्रेस वार्ता में महिला नेताओं ने साफ शब्दों में कहा कि देश की आधी आबादी अब प्रतीकात्मक हिस्सेदारी से संतुष्ट नहीं रहने वाली। उनका कहना था कि महिलाओं को बराबरी का संवैधानिक अधिकार मिलना चाहिए और इसके लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति के साथ-साथ सामाजिक दबाव भी जरूरी है। इस दौरान यह संदेश भी दिया गया कि आने वाले समय में महिलाओं की भूमिका सिर्फ मतदाता या समर्थक की नहीं, बल्कि निर्णायक नेतृत्व की होगी।
राजनीतिक हमलों के बीच कांग्रेस को भी सीधे तौर पर निशाने पर लिया गया। महिला नेताओं ने आरोप लगाया कि दशकों तक महिलाओं को समान अधिकार देने के मुद्दे पर ठोस पहल नहीं की गई। इसके विपरीत, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में महिला आरक्षण विधेयक का पारित होना एक ऐतिहासिक कदम बताया गया, जिसने अब कानून का रूप ले लिया है। उनका मानना है कि इससे लोकसभा और विधानसभा की संरचना में बड़ा बदलाव देखने को मिलेगा।
नेताओं ने यह भी स्पष्ट किया कि 33 प्रतिशत आरक्षण लागू होने के बाद सदनों में महिलाओं की संख्या ऐतिहासिक स्तर तक पहुंचेगी। यह बदलाव सिर्फ आंकड़ों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि नीति निर्माण और निर्णय प्रक्रिया में महिलाओं की सीधी भागीदारी सुनिश्चित करेगा। इससे राजनीति में संतुलन आएगा और महिलाओं की आवाज पहले से कहीं अधिक प्रभावशाली होगी।
प्रेस वार्ता में मौजूद डॉ. स्वाति अग्रवाल, डॉ. नेहा सिंह राजपूत और पुष्पा पाटले ने संयुक्त रूप से छत्तीसगढ़ की राजनीति को लेकर बड़ा दावा किया। उन्होंने कहा कि राज्य में जल्द ही बड़ा राजनीतिक बदलाव देखने को मिलेगा और वह दिन दूर नहीं जब छत्तीसगढ़ को एक महिला मुख्यमंत्री मिलेगा। यह बयान केवल संभावना नहीं, बल्कि एक स्पष्ट राजनीतिक लक्ष्य के रूप में सामने आया।
महिला नेतृत्व की क्षमता पर जोर देते हुए वक्ताओं ने इंदिरा गांधी, मीरा कुमार, प्रतिभा पाटिल और द्रौपदी मुर्मू जैसे उदाहरणों का हवाला दिया। उन्होंने कहा कि इन नेताओं ने साबित कर दिया है कि महिलाएं हर स्तर पर प्रभावी नेतृत्व देने में सक्षम हैं, ऐसे में उनकी क्षमता पर सवाल उठाना अनुचित है।
प्रेस वार्ता के दौरान माहौल तब और मुखर हो गया जब डॉ. नेहा सिंह राजपूत ने काव्य पाठ के माध्यम से महिलाओं को आत्मविश्वास और संघर्ष का संदेश दिया। उनके शब्दों में एक स्पष्ट आह्वान था कि यह आंदोलन अब प्रतीकात्मक नहीं रहा, बल्कि निर्णायक लड़ाई की ओर बढ़ चुका है।
अंत में महिला संगठन ने यह स्पष्ट कर दिया कि 33 प्रतिशत आरक्षण को उपलब्धि मानते हुए भी वे संतुष्ट नहीं होंगे। आधी आबादी के लिए 50 प्रतिशत भागीदारी का लक्ष्य तय किया गया है और इसे हासिल करने के लिए राजनीतिक, सामाजिक और वैचारिक स्तर पर लगातार प्रयास किए जाएंगे। बिलासपुर से उठी यह आवाज अब प्रदेश ही नहीं, बल्कि देश की राजनीति में एक नई बहस और दिशा तय करती नजर आ रही है।


