Tuesday, April 28, 2026
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तालाब बना मछली कारोबार का जरिया, गांव प्यासा: मछुआरा समिति पर जल दोहन के गंभीर आरोप, ग्रामीणों का फूटा गुस्सा

2.65 करोड़ से बना जलस्रोत सूखने की कगार पर, कुएं-हैंडपंप ठप; कलेक्टर से पट्टा निरस्त कर सख्त कार्रवाई की मांग 


बिलासपुर।
जिले के मस्तूरी क्षेत्र के ग्राम चौहा में भीषण गर्मी के बीच जल संकट ने अब गंभीर विवाद का रूप ले लिया है। गांव के जीवनदायिनी माने जाने वाले बांधा तालाब को लेकर ग्रामीणों और गंगा मछुआरा समिति के बीच टकराव खुलकर सामने आ गया है। ग्रामीणों का आरोप है कि समिति ने तालाब का पट्टा लेकर मछली पालन के नाम पर पानी का अंधाधुंध दोहन किया, जिससे आज पूरा गांव बूंद-बूंद पानी के लिए तरस रहा है।

ग्रामीणों द्वारा कलेक्टर को सौंपे गए ज्ञापन में बताया गया कि वर्ष 2009-2010 में लगभग 2 करोड़ 65 लाख रुपये की लागत से इस तालाब का निर्माण किया गया था। इसका मुख्य उद्देश्य क्षेत्र के भूजल स्तर को बनाए रखना और गांव के कुओं व हैंडपंपों में सालभर पानी उपलब्ध कराना था। शुरुआती वर्षों में तालाब ने अपनी उपयोगिता भी साबित की, लेकिन अब वही तालाब गांव के लिए संकट का कारण बन गया है।

आरोप है कि गंगा मछुआरा समिति ने पट्टा मिलने के बाद मछली उत्पादन बढ़ाने के लिए लगातार पानी की निकासी की, जिससे तालाब का जलस्तर तेजी से गिर गया। हालात यह हैं कि तालाब अब सूखने की कगार पर पहुंच चुका है और इसका सीधा असर गांव के अन्य जलस्रोतों पर पड़ा है। कुएं और हैंडपंप, जो पहले सालभर चलते थे, अब जवाब देने लगे हैं।

जलस्तर में आई इस गिरावट ने पूरे गांव को पेयजल संकट में धकेल दिया है। महिलाएं और बच्चे दूर-दराज से पानी लाने को मजबूर हैं, जिससे दैनिक जीवन बुरी तरह प्रभावित हो रहा है। ग्रामीणों का कहना है कि “मछली के लिए पानी बचाया जा रहा है, लेकिन इंसानों के पीने के लिए पानी खत्म हो रहा है।”

ज्ञापन में ग्रामीणों ने प्रशासन से मांग की है कि मामले की तत्काल जांच कराई जाए और गंगा मछुआरा समिति का पट्टा निरस्त किया जाए। साथ ही तालाब को उसके मूल उद्देश्य—जल संरक्षण—के लिए पुनः उपयोग में लाने की व्यवस्था की जाए। ग्रामीणों ने भविष्य में इस तरह के दुरुपयोग को रोकने के लिए सख्त नियम और निगरानी प्रणाली लागू करने की भी मांग की है।

भीषण गर्मी के इस दौर में जब पूरा जिला जल संकट से जूझ रहा है, ऐसे में जलस्रोतों का इस तरह व्यावसायिक दोहन गंभीर सवाल खड़े करता है। अब निगाहें प्रशासन पर टिकी हैं कि वह गांव की प्यास बुझाने के लिए क्या कदम उठाता है।

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