Monday, May 18, 2026
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850 ग्राम के नन्हे योद्धा ने जीती जिंदगी की जंग, 28 सप्ताह में जन्मे प्रीमैच्योर नवजात को श्री शिशु भवन हॉस्पिटल में मिला नया जीवन…

बिलासपुर। कहते हैं कि जब उम्मीदें जवाब देने लगती हैं, तब इंसान केवल दुआओं और चमत्कारों का सहारा खोजता है। ऐसा ही एक भावुक और प्रेरणादायक चमत्कार बिलासपुर के श्री शिशु भवन हॉस्पिटल में देखने को मिला, जहाँ डॉक्टरों की अथक मेहनत, आधुनिक चिकित्सा सुविधाओं और संवेदनशील देखभाल ने एक नन्हीं जिंदगी को मौत के मुहाने से वापस लौटा दिया।

30 मार्च 2026 को 28 सप्ताह में जन्मे एक अत्यंत गंभीर प्रीमैच्योर नवजात को अस्पताल में भर्ती कराया गया। जन्म के समय बच्चे का वजन मात्र 850 ग्राम था। इतनी कम उम्र और कम वजन में जन्म लेने के कारण उसके फेफड़े पूरी तरह विकसित नहीं थे। इसके साथ ही हृदय संबंधी गंभीर समस्याएं, मस्तिष्क में रक्तस्राव और बढ़ता संक्रमण उसकी जिंदगी के लिए बड़ा खतरा बन चुके थे। हर बीतता पल परिवार के लिए भय और अनिश्चितता से भरा हुआ था।

नवजात के पिता शिव कुमार मानकर और माता सुभाषिनी मानकर, निवासी हैदराबाद, अपने बच्चे की हालत देखकर पूरी तरह टूट चुके थे। लेकिन इसी कठिन समय में श्री शिशु भवन हॉस्पिटल के डायरेक्टर डॉ. श्रीकांत गिरी और उनकी अनुभवी टीम ने बिना समय गंवाए उपचार शुरू किया।

बच्चे की हर सांस पर चौबीसों घंटे निगरानी रखी गई। शुरुआती दिनों में उसे हाई ऑक्सीजन फ्लो सपोर्ट पर रखा गया, बाद में आवश्यकता पड़ने पर वेंटिलेटर सहायता और अन्य जीवनरक्षक उपचार दिए गए। लगातार निगरानी, संक्रमण नियंत्रण और विशेषज्ञ चिकित्सा के कारण धीरे-धीरे बच्चे की स्थिति में सुधार होने लगा।

करीब डेढ़ महीने तक चली इस कठिन जंग के बाद आखिरकार वह भावुक क्षण आया, जब इस नन्हे योद्धा ने जिंदगी की सबसे बड़ी लड़ाई जीत ली। शनिवार 17 मई 2026 को बच्चे को पूरी तरह स्वस्थ होने पर अस्पताल से छुट्टी दे दी गई।

अपने बच्चे को स्वस्थ गोद में लेकर माता-पिता की आंखें खुशी से भर आईं। भावुक होकर उन्होंने कहा कि उन्होंने बच्चे के बचने की उम्मीद लगभग छोड़ दी थी, लेकिन अस्पताल के डॉक्टरों और स्टाफ ने न केवल उनके बच्चे को नया जीवन दिया, बल्कि हर कठिन पल में उन्हें हिम्मत और भरोसा भी दिया।

इस संबंध में डॉ. श्रीकांत गिरी ने बताया कि 1 किलोग्राम से कम वजन और समय से पहले जन्म लेने वाले नवजातों का उपचार अत्यंत चुनौतीपूर्ण होता है। ऐसे बच्चों के फेफड़े, मस्तिष्क, आंतें और अन्य महत्वपूर्ण अंग पूरी तरह विकसित नहीं हो पाते, जिसके कारण सांस लेने, संक्रमण से लड़ने और भोजन पचाने में गंभीर दिक्कतें आती हैं। उन्होंने कहा कि 28 सप्ताह में जन्मे मात्र 850 ग्राम वजन के नवजात को स्वस्थ कर घर भेज पाना बिलासपुर जैसे शहर के लिए बड़ी उपलब्धि है।

इस सफल उपचार में एनआईसीयू प्रभारी डॉ. रवि द्विवेदी सहित डॉ. प्रणव अंधारे, डॉ. रोशन शुक्ला, डॉ. मोनिका जायसवाल, डॉ. प्रतिभा अग्रवाल, डॉ. नक्षत्र, डॉ. अनुराग कुमार, डॉ. विशाल मांझी तथा समस्त नर्सिंग एवं सहयोगी स्टाफ की भूमिका सराहनीय रही।

अस्पताल प्रबंधन के अनुसार समय-समय पर मेडिकल और नर्सिंग स्टाफ को आधुनिक चिकित्सा तकनीकों एवं संक्रमण नियंत्रण के लिए विशेष प्रशिक्षण भी दिया जाता है, जिसका लाभ गंभीर नवजातों के उपचार में मिल रहा है।

यह घटना केवल एक सफल इलाज की कहानी नहीं, बल्कि विश्वास, समर्पण और मानवता की मिसाल बन गई है — जहाँ डॉक्टरों की मेहनत और एक नन्हीं जान की जिजीविषा ने मिलकर जिंदगी को फिर मुस्कुराना सिखा दिया।

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