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15 साल बाद जागा विश्वविद्यालय! छात्रा का भविष्य दांव पर लगाने की कोशिश पर हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी…

बिलासपुर। शिक्षा व्यवस्था में प्रशासनिक लापरवाही का एक चौंकाने वाला मामला सामने आया है, जहां 15 साल पहले उत्तीर्ण की गई परीक्षा को अचानक अवैध बताकर एक छात्रा को उच्च शिक्षा की अंतिम परीक्षा से वंचित कर दिया गया। मामला इतना गंभीर था कि छात्रा को न्याय के लिए हाईकोर्ट की शरण लेनी पड़ी। अंततः अदालत ने विश्वविद्यालय के फैसले को निरस्त करते हुए छात्रा के पक्ष में महत्वपूर्ण आदेश जारी किया।

महासमुंद निवासी अस्मिता शर्मा की शैक्षणिक यात्रा वर्ष 2010 में बारहवीं परीक्षा उत्तीर्ण करने के साथ शुरू हुई। इसके बाद उन्होंने डीसीए डिप्लोमा किया और फिर बिलासपुर स्थित रमन विश्वविद्यालय से बीसीए की पढ़ाई पूरी की। उच्च शिक्षा के प्रति रुचि रखते हुए उन्होंने पंडित रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय, रायपुर से एमए इंग्लिश में प्रवेश लिया और परीक्षा भी सफलतापूर्वक उत्तीर्ण की।

बाद में बेहतर अंक प्राप्त करने के उद्देश्य से उन्होंने पुनः एमए की परीक्षा देकर 2018 में डिग्री हासिल की। इसके पश्चात प्री-बीएड परीक्षा उत्तीर्ण कर विश्वविद्यालय से संबद्ध कॉलेज में बीएड पाठ्यक्रम में प्रवेश लिया। दोनों सेमेस्टर सफलतापूर्वक पार करने के बाद जब वे अंतिम वर्ष की परीक्षा में शामिल होने वाली थीं, तभी विश्वविद्यालय ने अचानक उनकी पात्रता निरस्त कर दी।

विश्वविद्यालय का तर्क था कि छात्रा द्वारा वर्षों पहले किया गया डीसीए डिप्लोमा वैध नहीं था, इसलिए उनकी आगे की शैक्षणिक योग्यता भी प्रभावित होती है। हैरानी की बात यह रही कि जिस योग्यता के आधार पर छात्रा ने बीसीए, एमए और बीएड तक की पढ़ाई की, उसी पर 15 साल बाद सवाल उठाया गया।

इस निर्णय से परेशान होकर अस्मिता शर्मा ने अधिवक्ता प्रतीक शर्मा के माध्यम से छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में याचिका दायर की। मामले की सुनवाई जस्टिस ए.के. प्रसाद की एकलपीठ में हुई। अदालत ने पाया कि विश्वविद्यालय ने लंबे समय तक छात्रा की शैक्षणिक प्रगति को स्वीकार करने के बाद अंतिम चरण में पात्रता पर सवाल उठाया, जो न्यायसंगत नहीं है।

हाईकोर्ट ने विश्वविद्यालय के आदेश को निरस्त करते हुए स्पष्ट निर्देश दिया कि याचिकाकर्ता को 60 दिनों के भीतर पात्रता प्रमाणपत्र (Eligibility Certificate) जारी किया जाए। अदालत के इस फैसले को न केवल छात्रा के लिए राहत माना जा रहा है, बल्कि यह उन विद्यार्थियों के लिए भी महत्वपूर्ण संदेश है, जिन्हें वर्षों बाद प्रशासनिक त्रुटियों का खामियाजा भुगतना पड़ता है।

यह मामला केवल एक छात्रा के भविष्य का नहीं, बल्कि विश्वविद्यालयों की प्रशासनिक जवाबदेही पर भी बड़ा प्रश्नचिह्न खड़ा करता है। यदि किसी शैक्षणिक योग्यता में त्रुटि थी, तो उसे प्रवेश के समय या शुरुआती स्तर पर चिन्हित किया जाना चाहिए था। वर्षों तक पढ़ाई कराने, परीक्षाएं लेने और डिग्रियां जारी करने के बाद अचानक पात्रता निरस्त करना विद्यार्थियों के अधिकारों और उनके भविष्य दोनों के साथ अन्याय माना जा सकता है।

हाईकोर्ट का यह फैसला शिक्षा संस्थानों को यह संदेश देता है कि प्रशासनिक लापरवाही का बोझ छात्रों पर नहीं डाला जा सकता और विद्यार्थियों के भविष्य से जुड़े मामलों में न्याय, निष्पक्षता और समयबद्ध निर्णय सर्वोपरि हैं।

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