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तीन मासूमों की मौत… आखिर जिम्मेदार कौन? बारिश से भरे गड्ढे ने निगल ली तीन जिंदगियां, अब जवाबदेही तय होगी या फिर फाइलों में दफन हो जाएगा मामला?…

राजनांदगांव जिले के डोंगरगढ़ विकासखंड के गांधीनगर में बुधवार शाम जो हुआ, वह सिर्फ एक हादसा नहीं बल्कि कई गंभीर सवाल छोड़ गया है। आठ और छह साल के तीन मासूम बच्चे बारिश के पानी से भरे एक गहरे गड्ढे में डूब गए। कुछ ही पलों में तीन घरों के चिराग बुझ गए और पूरा गांव मातम में डूब गया। अब सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि बच्चे कैसे डूबे, बल्कि यह भी है कि आखिर ऐसी नौबत आई ही क्यों?

ग्रामीणों का आरोप है कि रेलवे निर्माण कार्य के दौरान ठेकेदार ने मिट्टी निकालकर गहरा गड्ढा छोड़ दिया था। बारिश के बाद वह गड्ढा पानी से भर गया और बाहर से सामान्य तालाब जैसा दिखाई देने लगा। यदि जांच में यह आरोप सही साबित होता है, तो यह केवल एक दुर्घटना नहीं बल्कि सुरक्षा नियमों की घोर अनदेखी का मामला होगा। निर्माण एजेंसियों की जिम्मेदारी होती है कि खुदाई वाले स्थानों पर बैरिकेडिंग, चेतावनी बोर्ड और सुरक्षा के पर्याप्त इंतजाम किए जाएं, ताकि कोई अनहोनी न हो। यदि ऐसा नहीं किया गया, तो यह लापरवाही सीधे-सीधे तीन मासूम जिंदगियों पर भारी पड़ी।

घटना के बाद यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या प्रशासन ने ऐसे खतरनाक स्थानों का कभी निरीक्षण किया? क्या स्थानीय स्तर पर किसी अधिकारी ने निर्माण कार्य के बाद छोड़े गए गड्ढों की जानकारी ली? यदि नहीं, तो जिम्मेदारी केवल ठेकेदार की नहीं बल्कि निगरानी व्यवस्था की भी बनती है। आखिर विकास कार्यों की कीमत मासूम बच्चों की जान देकर क्यों चुकानी पड़े?

ग्रामीणों ने शिक्षकों की हड़ताल का भी जिक्र किया है। उनका कहना है कि सामान्य दिनों में शिक्षक बच्चों को घर से स्कूल लाने और छोड़ने की व्यवस्था करते थे। हालांकि इस घटना का हड़ताल से कोई सीधा संबंध है, इसकी अभी कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। इसलिए इस पहलू पर जांच पूरी होने से पहले किसी निष्कर्ष पर पहुंचना उचित नहीं होगा। लेकिन यह जरूर स्पष्ट है कि गांवों में बच्चों की सुरक्षा को लेकर मजबूत व्यवस्था की जरूरत है।

हर बारिश के मौसम में ऐसे हादसे सामने आते हैं। कहीं खदानों में भरे पानी में बच्चे डूब जाते हैं, कहीं निर्माण स्थलों पर खुले गड्ढे मौत का जाल बन जाते हैं। हादसे के बाद जांच बैठती है, मुआवजे की घोषणा होती है, कार्रवाई के आश्वासन दिए जाते हैं और कुछ दिनों बाद मामला ठंडे बस्ते में चला जाता है। लेकिन जिन परिवारों ने अपने बच्चों को खोया है, उनके लिए यह दर्द जिंदगी भर खत्म नहीं होता।

अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या इस बार भी जांच केवल औपचारिकता बनकर रह जाएगी, या फिर वास्तव में जिम्मेदार लोगों पर कार्रवाई होगी? यदि निर्माण कार्य के दौरान सुरक्षा मानकों की अनदेखी हुई है, तो दोषियों पर सख्त कार्रवाई होना जरूरी है। क्योंकि तीन मासूमों की मौत सिर्फ एक आंकड़ा नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम के लिए चेतावनी है कि विकास के नाम पर लापरवाही अब और बर्दाश्त नहीं की जा सकती।

गांधीनगर की यह घटना पूरे प्रदेश के लिए सबक है। खुले गड्ढे, अधूरे निर्माण और सुरक्षा इंतजामों की अनदेखी किसी भी गांव या शहर में अगली त्रासदी का कारण बन सकती है। प्रशासन, निर्माण एजेंसियों और संबंधित विभागों को यह सुनिश्चित करना होगा कि विकास कार्य लोगों की जान के लिए खतरा न बनें। वरना हर बरसात के साथ ऐसे दर्दनाक हादसे दोहराए जाते रहेंगे और हर बार सवाल वही रहेगा—आखिर जिम्मेदार कौन?

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