Wednesday, February 25, 2026
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मोपका के सरकारी स्कूल में ‘वेतन के बदले वसूली’: 15 हजार की रिश्वत लेते प्राचार्य गिरफ्तार…

भाटापारा/रायपुर, 25 फरवरी 2026। छत्तीसगढ़ के भाटापारा स्थित मोपका क्षेत्र से भ्रष्टाचार का एक चौंकाने वाला मामला सामने आया है। शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय मोपका के प्राचार्य आरएन बया को एंटी करप्शन ब्यूरो (ACB) की टीम ने 15,000 रुपये की रिश्वत लेते रंगे हाथों पकड़ लिया। कार्रवाई सुनियोजित ट्रैप के तहत की गई, जिसने शिक्षा विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

मामले की शुरुआत मोपका निवासी खेमेश्वर डाडे की शिकायत से हुई। उनके पिता विजय कुमार डाडे विद्यालय में व्याख्याता हैं और वर्ष 2017-18 की दुर्घटना के बाद दिव्यांग हो गए थे। परिवार का आरोप है कि दिव्यांगता के बावजूद नियमित रूप से सेवा देने वाले शिक्षक से प्राचार्य द्वारा वेतन आहरण के एवज में हर महीने 10,000 रुपये की अवैध मांग की जाती रही।

शिकायत में यह भी दावा है कि कई बार रकम नकद के बजाय सीधे आरोपी के बैंक खाते में जमा कराई गई। यानी वेतन—जो एक कर्मचारी का संवैधानिक अधिकार है—उसी को ‘कमाई का जरिया’ बना दिया गया।

परिवार का कहना है कि करीब छह माह पहले रिश्वत की रकम बढ़ाकर 15,000 रुपये कर दी गई। रकम न देने पर छह महीने का वेतन रोक लिया गया। विभागीय स्तर पर शिकायत के बावजूद जब राहत नहीं मिली, तब परिवार ने ACB का दरवाजा खटखटाया।

ACB रायपुर ने नियमानुसार सत्यापन के बाद 25 फरवरी 2026 को ट्रैप बिछाया। योजनाबद्ध कार्रवाई में प्राचार्य आरएन बया को भाटापारा रेलवे स्टेशन के समीप शिकायतकर्ता से 15,000 रुपये लेते हुए रंगे हाथों पकड़ा गया।

ACB अधिकारियों के अनुसार, आरोपी के खिलाफ भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 (संशोधित 2018) की धारा 7 के तहत प्रकरण दर्ज किया गया है और पूछताछ जारी है।

यह मामला केवल एक व्यक्ति की गिरफ्तारी भर नहीं है। सवाल यह है कि क्या वर्षों तक वेतन के बदले वसूली होती रही और किसी स्तर पर निगरानी नहीं हुई? यदि शिकायतें पहले की गई थीं, तो कार्रवाई क्यों नहीं हुई?

दिव्यांग शिक्षक से कथित वसूली का आरोप संवेदनहीनता की पराकाष्ठा दर्शाता है। शिक्षा जैसे पवित्र क्षेत्र में यदि वेतन को ‘मोलभाव’ का विषय बनाया जाए, तो यह न केवल कानून का उल्लंघन है, बल्कि नैतिक पतन का भी संकेत है।

आगे क्या?

अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि जांच में और कौन-कौन से तथ्य सामने आते हैं। क्या बैंक ट्रांजैक्शन की जांच होगी? क्या विभागीय जिम्मेदारियों की भी पड़ताल होगी?

फिलहाल, ACB की कार्रवाई ने यह संदेश जरूर दिया है कि शिकायत सही तरीके से दर्ज हो और सबूत पुख्ता हों, तो कानून का शिकंजा कसता है—चाहे पद कितना भी ऊंचा क्यों न हो।

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