बिलासपुर।
छत्तीसगढ़ में आंगनबाड़ी कार्यकर्ता एवं सहायिकाओं की अनदेखी एक बार फिर सवालों के घेरे में है। संयुक्त मंच छत्तीसगढ़ आंगनबाड़ी कार्यकर्ता सहायिका संघ, जिला बिलासपुर द्वारा मुख्यमंत्री, वित्त मंत्री और महिला एवं बाल विकास मंत्री को भेजे गए ज्ञापन में वर्षों से लंबित मांगों को लेकर गंभीर चिंता जताई गई है। ज्ञापन में कहा गया है कि देश में आईसीडीएस योजना की शुरुआत 2 अक्टूबर 1975 को हुई थी और अब लगभग 50 वर्ष पूरे हो चुके हैं, लेकिन आज भी आंगनबाड़ी कार्यकर्ता और सहायिकाएं बुनियादी अधिकारों से वंचित हैं।
संघ के अनुसार पूरे देश में लगभग 27 लाख और छत्तीसगढ़ में एक लाख से अधिक आंगनबाड़ी कार्यकर्ता-सहायिकाएं सेवाएं दे रही हैं। इसके बावजूद इन्हें न तो शासकीय कर्मचारी का दर्जा मिला है और न ही सम्मानजनक मानदेय। वर्तमान में कार्यकर्ताओं को मात्र 4500 रुपये और सहायिकाओं को 2250 रुपये प्रतिमाह मानदेय दिया जा रहा है, जो न्यूनतम पारिश्रमिक कानून का खुला उल्लंघन बताया गया है।
ज्ञापन में यह भी उल्लेख किया गया है कि सेवा निवृत्ति के बाद न कोई पेंशन की व्यवस्था है, न एकमुश्त ग्रेच्युटी। बीमारी, दुर्घटना या पारिवारिक जिम्मेदारियों के समय भी कोई सामाजिक सुरक्षा उपलब्ध नहीं है। इलाज से लेकर बेटा-बेटी की शादी तक के लिए इन्हें कर्ज़ या मानदेय कटौती का सहारा लेना पड़ता है।
आंगनबाड़ी कार्यकर्ता केवल पोषण और बच्चों की देखभाल तक सीमित नहीं हैं, बल्कि जनगणना, चुनाव, सर्वे, टीकाकरण, पोषण अभियान जैसे बहुद्देशीय कार्यों का बोझ भी उठाती हैं। इसके बावजूद थोड़ी सी चूक पर सेवा से हटाए जाने का डर हमेशा बना रहता है।
प्रमुख मांगें क्या हैं?
संघ ने सरकार के समक्ष दो प्रमुख मांगें रखी हैं—
- सेवा निवृत्त कार्यकर्ताओं को 5 लाख और सहायिकाओं को 4 लाख रुपये एकमुश्त ग्रेच्युटी, साथ ही क्रमशः 10,000 और 8,000 रुपये मासिक पेंशन व समूह बीमा योजना का लाभ।
- आंगनबाड़ी कार्यकर्ता और सहायिकाओं को शासकीय कर्मचारी घोषित किए जाने तक कम से कम 26,000 रुपये (कार्यकर्ता) और 22,100 रुपये (सहायिका) प्रतिमाह मानदेय स्वीकृत किया जाए। ज्ञापन में यह भी उल्लेख है कि मध्यप्रदेश जैसे राज्यों में इससे कहीं अधिक मानदेय दिया जा रहा है।
संघ ने आगामी विधानसभा बजट सत्र में इन मांगों को शामिल कर पूरा करने की अपील की है। साथ ही केंद्र सरकार और प्रधानमंत्री को भी पत्र भेजकर सहयोग की मांग की गई है।
अब बड़ा सवाल यह है कि क्या 50 वर्षों से सेवा दे रही आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं को उनका हक मिलेगा, या फिर हर बार की तरह उनकी आवाज़ कागज़ों में ही दबकर रह जाएगी?


