Sunday, March 22, 2026
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बिलासपुर: नारायण ई-टेक्नो स्कूल का बहुस्तरीय खेल: शिक्षा के नाम पर मान्यता, फीस और कारोबार का उलझा जाल…

बिलासपुर। नेहरू नगर स्थित नारायण ई-टेक्नो स्कूल को लेकर सामने आए दस्तावेज़ अब महज अनियमितताओं की कहानी नहीं रह गए हैं, बल्कि एक ऐसे जटिल और बहुस्तरीय ढांचे को उजागर कर रहे हैं, जहां शिक्षा, आर्थिक गतिविधियां और प्रशासनिक शिथिलता आपस में गहराई से जुड़ी हुई नजर आती हैं। हर नई जानकारी इस व्यवस्था की परतों को और गंभीर बनाती जा रही है।

करीब एक दशक पहले डॉल्फिन स्कूल विवाद ने जिस तरह शिक्षा व्यवस्था पर सवाल खड़े किए थे, मौजूदा मामला उससे कहीं अधिक व्यापक और संगठित प्रतीत होता है। उपलब्ध रिकॉर्ड यह संकेत देते हैं कि यहां केवल नियमों की अनदेखी नहीं, बल्कि एक व्यवस्थित मॉडल के तहत संचालन किया जा रहा है।

सबसे गंभीर पहलुओं में से एक है मान्यता और शैक्षणिक पैटर्न के बीच का विरोधाभास। स्कूल में CBSE पैटर्न के अनुरूप पढ़ाई कराई जा रही है, जबकि दस्तावेज़ यह स्पष्ट करते हैं कि उसी स्तर की आधिकारिक मान्यता उपलब्ध नहीं है। आठवीं तक की मान्यता के बीच उच्च कक्षाओं की तैयारी कराना सीधे तौर पर छात्रों के भविष्य के साथ जोखिम जुड़ा हुआ मामला बन जाता है। बोर्ड परीक्षाओं की तैयारी कर रहे छात्रों के लिए यह स्थिति केवल प्रक्रियात्मक नहीं, बल्कि करियर पर प्रभाव डालने वाली है।

वित्तीय लेन-देन का ढांचा भी उतना ही चिंताजनक है। अभिभावकों द्वारा जमा की जाने वाली फीस स्कूल के स्थानीय खाते में न जाकर NSPIRA से जुड़े बाहरी खातों—नेल्लौर और मुंबई—तक पहुंचती है। यह व्यवस्था न केवल पारदर्शिता पर सवाल उठाती है, बल्कि यह भी दर्शाती है कि शिक्षा के नाम पर एक व्यापक वित्तीय नेटवर्क संचालित हो रहा है, जो स्थानीय निगरानी से बाहर है।

दस्तावेज़ों के अनुसार NSPIRA एक व्यावसायिक इकाई के रूप में नारायण एजुकेशन सोसाइटी से जुड़ी हुई है, जिसके माध्यम से यूनिफॉर्म, किताबें और अन्य शैक्षणिक सामग्री की आपूर्ति का केंद्रीकृत सिस्टम संचालित किया जा रहा है। हैरानी की बात यह है कि यह कंपनी राज्य में स्पष्ट रूप से पंजीकृत नहीं दिखाई देती, इसके बावजूद प्रदेश के कई शहरों—रायपुर, बिलासपुर, दुर्ग और भिलाई—में इसी के माध्यम से सामग्री की बिक्री और वितरण हो रहा है।

इस व्यवस्था का एक और पहलू अभिभावकों पर पड़ने वाला दबाव है। निर्धारित विक्रेताओं से ही यूनिफॉर्म और किताबें खरीदने की बाध्यता, और कई बार अनावश्यक पूरी किट लेने की मजबूरी, एकाधिकार की स्थिति को दर्शाती है। इससे न केवल विकल्प सीमित होते हैं, बल्कि गुणवत्ता और कीमत दोनों पर सवाल खड़े होते हैं।

रिकॉर्ड में दर्ज पते और वास्तविक स्थिति के बीच का अंतर भी इस पूरे मामले को और संदिग्ध बनाता है। सिटी मार्केटिंग ऑफिस के रूप में दर्ज स्थान मार्च 2025 में बंद हो चुका है, लेकिन उसी पते का उपयोग अब भी रसीदों में किया जा रहा है। यह स्थिति अभिभावकों के बीच भ्रम पैदा करने के साथ-साथ वित्तीय पारदर्शिता को लेकर गंभीर प्रश्न खड़े करती है।

दस्तावेज़ यह भी संकेत देते हैं कि विद्यालय परिसर का उपयोग केवल शिक्षा तक सीमित नहीं है, बल्कि इसे स्टोरेज और डिस्ट्रीब्यूशन सेंटर के रूप में भी इस्तेमाल किया जा रहा है। शाखा स्तर पर सामग्री का वितरण और आपूर्ति स्कूल परिसर से संचालित होना इस बात की पुष्टि करता है कि शैक्षणिक ढांचा एक व्यावसायिक प्रणाली का हिस्सा बन चुका है।

कर्मचारियों से जुड़े PF और ESI रिकॉर्ड भी स्थानीय के बजाय बाहरी संस्थानों—नेल्लौर और मुंबई—से जुड़े हुए पाए गए हैं। ऐसी स्थिति में कर्मचारियों के अधिकारों और कानूनी प्रक्रियाओं के लिए राज्य से बाहर निर्भरता उनकी स्थिति को और जटिल बना सकती है।

शिक्षा संस्थानों के लिए निर्धारित नियम स्पष्ट रूप से नॉन-प्रॉफिट मॉडल की बात करते हैं और व्यावसायिक गतिविधियों से दूरी बनाए रखना अनिवार्य बताते हैं। लेकिन इस मामले में उपलब्ध दस्तावेज़ एक ऐसे मॉडल की ओर इशारा करते हैं, जहां शिक्षा और व्यापार के बीच की रेखा लगभग समाप्त हो चुकी है।

इन सभी तथ्यों के सामने आने के बावजूद जिला शिक्षा विभाग की ओर से ठोस कार्रवाई का अभाव सबसे बड़ा सवाल बनकर उभर रहा है। यह स्थिति या तो निगरानी तंत्र की निष्क्रियता को दर्शाती है या फिर मामले की गंभीरता को नजरअंदाज किए जाने की आशंका को मजबूत करती है।

नारायण ई-टेक्नो स्कूल का यह मामला अब केवल एक संस्थान तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह पूरे शिक्षा तंत्र की विश्वसनीयता पर सवाल खड़ा कर रहा है। यदि समय रहते निष्पक्ष जांच और कठोर कार्रवाई नहीं की गई, तो इसका सबसे बड़ा खामियाजा उन छात्रों और अभिभावकों को भुगतना पड़ेगा, जिन्होंने शिक्षा के नाम पर इस व्यवस्था पर भरोसा किया है।

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