बिलासपुर। मंगलवार शाम आई तेज आंधी ने एक बार फिर शहर की बिजली व्यवस्था की हकीकत उजागर कर दी। कुछ ही घंटों की प्राकृतिक आपदा ने पूरे शहर को अंधेरे में डुबो दिया—कहीं तार टूटे, कहीं खंभे गिरे, तो कहीं पेड़ों ने बिजली लाइनों को जकड़ लिया। नतीजा—घंटों नहीं, बल्कि कई इलाकों में अब तक बिजली बहाल नहीं हो पाई है। इस बीच आम नागरिक गर्मी, मच्छरों और पानी की किल्लत से जूझने को मजबूर हैं।
यह सही है कि बिजली विभाग के अधिकारी और कर्मचारी मौके पर सक्रिय रहे, अलग-अलग टीमें बनाकर सुधार कार्य भी किया गया। लेकिन सवाल यह है कि हर बार ऐसी स्थिति क्यों बनती है? क्या हर आंधी-तूफान “अचानक” ही आता है, या हमारी तैयारी ही हमेशा अधूरी रहती है?

बिजली विभाग साल भर “मेंटेनेंस” के नाम पर घंटों सप्लाई बंद रखता है। दावे किए जाते हैं कि लाइनों की जांच हो रही है, पेड़ों की छंटाई की जा रही है, खंभों की मजबूती बढ़ाई जा रही है। फिर एक सामान्य आंधी इतनी बड़ी समस्या कैसे बन जाती है? अगर दर्जनों जगह पेड़ गिर रहे हैं और तार टूट रहे हैं, तो यह साफ संकेत है कि जोखिम वाले पेड़ों और कमजोर ढांचे की पहचान पहले से नहीं की गई।
असल समस्या सिस्टम की “रिएक्टिव” कार्यशैली है—घटना के बाद भागदौड़, लेकिन पहले से कोई ठोस तैयारी नहीं। शहर में ऐसे सैकड़ों पेड़ हैं जो हर साल तूफान में खतरा बनते हैं। क्या उनका सर्वे हुआ? क्या बिजली लाइनों के आसपास नियमित छंटाई हुई? अगर नहीं, तो मेंटेनेंस सिर्फ कागजों में ही सीमित है।
दूसरी बड़ी समस्या स्टाफ की कमी बताई जाती है। अगर यह सच है, तो यह और भी गंभीर मुद्दा है। एक बढ़ते शहर के लिए बिजली जैसी मूलभूत सेवा में पर्याप्त मानव संसाधन न होना सीधे-सीधे लापरवाही है। और अगर स्टाफ की कमी के बावजूद काम चलाया जा रहा है, तो इसका खामियाजा आखिरकार जनता ही भुगतेगी—जैसा कि इस बार हुआ।
हर साल आंधी-तूफान आते हैं, हर साल बिजली व्यवस्था चरमराती है, और हर साल वही सफाई—“प्राकृतिक आपदा”। लेकिन अब यह बहाना नहीं चल सकता। जरूरत है एक ठोस, दीर्घकालिक योजना की—
- जोखिम वाले पेड़ों की वैज्ञानिक पहचान और समय रहते छंटाई
- कमजोर लाइनों और खंभों का समय पर प्रतिस्थापन
- पर्याप्त स्टाफ और आधुनिक उपकरणों की उपलब्धता
- और सबसे जरूरी—जवाबदेही तय करना
बिलासपुर की जनता यह जानना चाहती है कि आखिर कब तक हर आंधी के बाद शहर अंधेरे में डूबता रहेगा? मेंटेनेंस का मतलब सिर्फ बिजली काटना नहीं, बल्कि संकट को पहले ही टाल देना होता है। अगर यह नहीं हो पा रहा, तो व्यवस्था पर सवाल उठना लाजमी है।
अब वक्त आ गया है कि बिजली विभाग “सीखने” की बात करना बंद करे और वास्तव में सीख लेकर बदलाव दिखाए—वरना हर आंधी के साथ शहर यूं ही अंधेरे में डूबता रहेगा।


