Tuesday, May 5, 2026
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शिकायतों की बौछार से हिला शिक्षा विभाग: बिलासपुर में पदोन्नति घोटाले, नियमों की अनदेखी और अधिकारियों पर कसता शिकंजा…

बिलासपुर में शिक्षा विभाग से जुड़े कथित भ्रष्टाचार के खिलाफ पिछले तीन महीनों से उठ रही आवाज अब प्रशासनिक हलचल में बदलती दिख रही है। लगातार शिकायतों, दस्तावेजी दावों और नियमों के उल्लंघन के आरोपों के बीच यह मामला अब सिर्फ विभागीय असंतोष तक सीमित नहीं रहा, बल्कि जवाबदेही की मांग का बड़ा प्रश्न बन चुका है।

कांग्रेस नेता अंकित गौरहा ने शिक्षा विभाग में पदोन्नति, युक्तिकरण, अनुकंपा नियुक्ति और अन्य प्रशासनिक प्रक्रियाओं में अनियमितताओं का आरोप लगाते हुए बीते तीन महीनों में 20 से अधिक शिकायतें विभिन्न स्तरों पर भेजीं। इन शिकायतों में मुख्यमंत्री, शिक्षा मंत्री, मुख्य सचिव, शिक्षा सचिव, कलेक्टर, कमिश्नर और संयुक्त संचालक शिक्षा तक को संबोधित किया गया। गौरहा का दावा है कि इन शिकायतों के साथ दस्तावेजी प्रमाण भी प्रस्तुत किए गए, जिनमें नियमों की अनदेखी, चयन प्रक्रिया में पक्षपात और प्रशासनिक मनमानी के कई उदाहरण शामिल हैं।

लगातार उठाए गए इन सवालों के बाद अब जिला शिक्षा विभाग में व्यापक बदलाव की चर्चा तेज हो गई है। ताजा घटनाक्रम में अंकित गौरहा ने संयुक्त संचालक शिक्षा, बिलासपुर को एक और विस्तृत शिकायत सौंपी है, जिसमें जिला शिक्षा अधिकारी विजय टांडे और बाबू सुनील यादव की भूमिका पर गंभीर सवाल खड़े किए गए हैं। शिकायत में आरोप लगाया गया है कि पदोन्नति आदेश जारी करने में वरिष्ठता सूची की अनदेखी की गई, न्यायालय के निर्देशों के बावजूद संशोधित आदेश जारी कर प्रक्रिया को प्रभावित किया गया और पात्रता के बजाय पक्षपात को प्राथमिकता दी गई।

यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि आरोप केवल प्रशासनिक त्रुटियों तक सीमित नहीं हैं। शिकायतों में कहा गया है कि जिन प्रक्रियाओं का सीधा संबंध शिक्षकों के अधिकारों, पदस्थापन और सेवा सम्मान से है, उनमें पारदर्शिता के बजाय प्रभाव और दबाव का इस्तेमाल किया गया। यदि ये आरोप सही साबित होते हैं, तो इसका असर केवल कुछ कर्मचारियों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरी शिक्षा व्यवस्था की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े होंगे।

अंकित गौरहा ने इस पूरे मुद्दे को राजनीतिक संघर्ष के बजाय व्यवस्था सुधार की लड़ाई बताया है। उनका कहना है कि शिक्षक केवल सरकारी कर्मचारी नहीं, बल्कि समाज की बुनियाद गढ़ने वाले स्तंभ हैं। यदि उनके साथ ही अन्याय होगा, तो शिक्षा व्यवस्था का नैतिक आधार कमजोर होगा और उसका सीधा असर विद्यार्थियों के भविष्य पर पड़ेगा।

बिलासपुर में अब स्थिति ऐसी बनती दिख रही है जहां शिकायतें केवल फाइलों में बंद नहीं रह गई हैं। जिला शिक्षा अधिकारी पर कार्रवाई की प्रक्रिया और संयुक्त संचालक शिक्षा पर बढ़ता दबाव यह संकेत दे रहा है कि मामला उच्च स्तर पर गंभीरता से लिया जा रहा है। आने वाले दिनों में यह स्पष्ट होगा कि यह हलचल केवल औपचारिक जांच तक सीमित रहती है या फिर विभागीय जवाबदेही तय करने की दिशा में ठोस कदम भी उठाए जाते हैं।

फिलहाल इतना साफ है कि बिलासपुर के शिक्षा विभाग में उठे ये सवाल अब सामान्य प्रशासनिक विवाद नहीं रहे। यह संघर्ष अब उस बिंदु पर पहुंच चुका है जहां शिक्षक, कर्मचारी और आम नागरिक यह देख रहे हैं कि क्या व्यवस्था वास्तव में खुद को सुधारने की क्षमता रखती है, या फिर भ्रष्टाचार के आरोप एक बार फिर फाइलों के बोझ तले दब जाएंगे।

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