बिलासपुर।
बिलासपुर, रायपुर, दुर्ग और भिलाई में संचालित नारायण ई-टेक्नो स्कूल इन दिनों गंभीर सवालों के घेरे में है। शिक्षा से जुड़े इस संस्थान पर अब केवल शैक्षणिक गुणवत्ता ही नहीं, बल्कि उसके संचालन, वित्तीय व्यवस्था और पारदर्शिता को लेकर भी कई अहम प्रश्न उठ रहे हैं। सामने आए दस्तावेज और स्थानीय स्तर पर मिली जानकारी एक ऐसे ढांचे की ओर इशारा करते हैं, जहां नियमों और वास्तविक संचालन के बीच स्पष्ट अंतर नजर आता है।
सबसे बड़ा मुद्दा स्कूल की मान्यता को लेकर सामने आया है। उपलब्ध दस्तावेजों के अनुसार, बिलासपुर स्थित इस संस्थान को राज्य शासन से केवल कक्षा 1 से 8 तक संचालन की अनुमति प्राप्त है। इसके बावजूद अभिभावकों को कक्षा 1 से 12वीं तक सीबीएसई पाठ्यक्रम संचालित होने की जानकारी दी जाती रही। ऐसे में सवाल उठता है कि उच्च कक्षाओं की पढ़ाई किस आधार पर कराई जा रही है, जब न तो राज्य स्तर पर अनुमति है और न ही स्पष्ट संबद्धता।
प्रबंधन का दावा है कि 1 अप्रैल 2026 से सीबीएसई मान्यता प्रभावी होगी, लेकिन इससे पहले के डेढ़ साल के दौरान ली गई फीस को लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं है। यह जांच का विषय बनता है कि क्या अभिभावकों को वास्तविक स्थिति की पूरी जानकारी दी गई थी या नहीं।
वित्तीय व्यवस्था भी संदेह के घेरे में है। जानकारी के अनुसार, छत्तीसगढ़ में संचालित इन स्कूलों के नाम से कोई स्थानीय अधिकृत बैंक खाता उपलब्ध नहीं है। अभिभावकों से फीस ऑनलाइन या QR कोड के माध्यम से ली जाती है, लेकिन राशि सीधे मुंबई, और नेल्लोर स्थित केंद्रीय खातों में ट्रांसफर हो जाती है। इससे स्थानीय स्तर पर न तो लेखा-जोखा स्पष्ट है और न ही जवाबदेही तय हो पा रही है।
दस्तावेजों में NSPIRA नामक संस्था की भूमिका भी सामने आई है, जिसे प्रबंधन “सिस्टर कंसर्न” बताता है। हालांकि छत्तीसगढ़ में इस संस्था का कोई स्पष्ट वैधानिक पंजीयन या अधिकृत कार्यालय दर्ज नहीं है। इसके बावजूद फीस रसीदों में NSPIRA से जुड़े कर्मचारियों के हस्ताक्षर पाए गए हैं, जिससे वित्तीय लेन-देन की वैधता पर सवाल खड़े होते हैं।
प्रशासनिक स्तर पर भी कई विसंगतियां सामने आई हैं। कर्मचारियों की नियुक्तियां NSPIRA के माध्यम से की जा रही हैं, जबकि संस्था की वैधानिक स्थिति अस्पष्ट है। इसके साथ ही EPF और ESI जैसे श्रम कानूनों के पालन को लेकर भी स्पष्ट जानकारी सामने नहीं आई है। कुछ कर्मचारियों ने यह भी बताया कि नियुक्ति के दौरान उनके मूल शैक्षणिक दस्तावेज जमा कराए गए हैं, जो नियमों के अनुरूप है या नहीं, यह जांच का विषय है।
इस पूरे घटनाक्रम का सबसे बड़ा असर अभिभावकों और छात्रों पर पड़ रहा है। जिन बच्चों का पहले ही प्रवेश हो चुका है, उनके सामने असमंजस की स्थिति है—क्या वे पढ़ाई जारी रखें या किसी अन्य स्कूल में स्थानांतरण कराएं। दोनों ही विकल्पों में बच्चों की पढ़ाई प्रभावित होने की आशंका बनी हुई है।
इतने गंभीर आरोपों और दस्तावेजों के सामने आने के बावजूद जिला शिक्षा विभाग और प्रशासन की ओर से अब तक कोई ठोस कार्रवाई या स्पष्ट प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। इससे यह सवाल और गहरा हो जाता है कि क्या इस पूरे मामले की निष्पक्ष और विस्तृत जांच होगी।
यह मामला केवल एक स्कूल तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह शिक्षा व्यवस्था की पारदर्शिता, वित्तीय नियंत्रण और प्रशासनिक जवाबदेही से जुड़ा बड़ा मुद्दा बन चुका है। अब जरूरत इस बात की है कि संबंधित प्राधिकरण इस मामले की गंभीरता को समझते हुए जल्द से जल्द जांच शुरू करे, ताकि सच्चाई सामने आ सके और अभिभावकों व छात्रों के हितों की रक्षा सुनिश्चित हो सके।


