Monday, April 27, 2026
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मान्यता के नाम पर मायाजाल, फीस के नाम पर खुली लूट: बिलासपुर में ‘डुप्लीकेट कोड’ से चल रहा स्कूल, बच्चों के भविष्य पर खतरा और सिस्टम की चुप्पी…

बिलासपुर। न्यायधानी में शिक्षा व्यवस्था को लेकर एक गंभीर मामला सामने आया है, जिसमें एक निजी स्कूल पर नियमों की अनदेखी कर अभिभावकों से कथित रूप से अवैध वसूली और दस्तावेजों में हेराफेरी के आरोप लगे हैं। यह मामला न सिर्फ एक संस्थान तक सीमित है, बल्कि पूरे सिस्टम की पारदर्शिता और निगरानी पर भी सवाल खड़े करता है।

व्यापार विहार स्थित बिरला ओपन माइंड इंटरनेशनल स्कूल को लेकर आरोप है कि यह संस्थान बिना वैध मान्यता के संचालित हो रहा है। सबसे गंभीर आरोप सीबीएसई संबद्धता कोड के उपयोग को लेकर है। कहा जा रहा है कि स्कूल द्वारा एडमिशन और अन्य दस्तावेजों में जिस कोड का इस्तेमाल किया जा रहा है, वह वास्तव में किसी अन्य मान्यता प्राप्त शाखा से जुड़ा है। यदि यह सही पाया जाता है, तो यह अभिभावकों को गुमराह करने और नियमों के उल्लंघन का मामला बनता है।

अभिभावकों की शिकायतों के अनुसार, स्कूल में हर साल एडमिशन फीस के नाम पर भारी रकम वसूली जाती है और कॉशन मनी की वापसी को लेकर भी स्पष्टता नहीं है। फीस संरचना सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं कराई गई है, जिससे पारदर्शिता पर सवाल उठते हैं। इसके अलावा, छत्तीसगढ़ पाठ्य पुस्तक निगम की किताबों के बजाय निजी प्रकाशनों की महंगी किताबें खरीदने के लिए दबाव बनाने और एक तय दुकान से ही सामग्री लेने को मजबूर करने के आरोप भी सामने आए हैं।

यह पूरा मामला कई महत्वपूर्ण कानूनों और नियमों के संभावित उल्लंघन की ओर इशारा करता है, जिनमें निशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा अधिकार अधिनियम 2009, छत्तीसगढ़ फीस विनियमन अधिनियम 2020 और सीबीएसई के संबद्धता उपबंध शामिल हैं। इन नियमों के तहत स्कूलों को पारदर्शी फीस, वैध मान्यता और अभिभावकों को स्वतंत्र विकल्प देना अनिवार्य होता है।

इस बीच, जिला शिक्षा विभाग की भूमिका पर भी सवाल उठ रहे हैं। आरोप है कि इतने गंभीर मुद्दों के बावजूद अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई है, जिससे जांच की निष्पक्षता पर संदेह पैदा होता है।

पूरे घटनाक्रम ने अभिभावकों की चिंता बढ़ा दी है। उनका कहना है कि बच्चों के भविष्य के साथ किसी भी प्रकार का जोखिम स्वीकार्य नहीं है और ऐसे मामलों में त्वरित व निष्पक्ष कार्रवाई जरूरी है। अब देखना यह होगा कि प्रशासन इस मामले में कितनी गंभीरता दिखाता है और क्या शिक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता और भरोसा बहाल हो पाता है।

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